संयम आत्मा का अनुशासन है, स्व और पर का भेद समझने पर ही मुक्ति मिलेंगीआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

संयम आत्मा का अनुशासन है, स्व और पर का भेद समझने पर ही मुक्ति मिलेंगीआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
ऋषभदेव केशरिया जी 1008 श्री ऋषभ देव भगवान आज मोक्ष कल्याणक दिवस है जब भगवान धरती पर अवतरित हुए थे, उनका जन्म हुआ। उसके पहले भोगभूमि का काल था ,भोग प्रधान जीवन होता था।कल्प वृक्ष से इच्छित सामग्री याचना करने पर प्राप्त होती थी सभी के जीवन में कोई कर्म नहीं थे । जन्म के बाद भगवान ने असि,मसि, कृषि , शिल्प, विद्या , वाणिज्य 6 कर्मों का ज्ञान कराया 84 लाख पूर्व की आयु में 83 लाख वर्ष सृष्टि की व्यवस्था राज पाट में हो गए। जब 1 लाख वर्ष की आयु शेष थी तब उन्होंने शरीर,संसार विषय भोगो से वैराग्य प्राप्त कर दीक्षा धारण की।यह मंगल देशना श्री ऋषभ देव केशरिया जी की धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने प्रकट किए। ब्रह्मचारी गजू भैय्या,राजेश पंचोलिया ,योगेश गंगावत अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि कर्म का अर्थ होता है पुरुषार्थ ,धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष यह चार पुरुषार्थ है। अर्थ और काम पुरुषार्थ की शिक्षा युग के आदि में देने के बाद जब श्री आदिनाथ भगवान ने केवल ज्ञान प्राप्त किया तो धर्म पुरुषार्थ भी कैसे किया जाता है इस बात को बतलाया ,क्योंकि धर्म पुरुषार्थ मोक्ष पुरुषार्थ की प्राप्ति का कारण है ।मोक्ष के लिए जो कुछ करना है ,वह ही धर्म है और उसी से मोक्ष की प्राप्ति होती है वही मोक्ष पुरुषार्थ कहलाता है।  श्री ऋषभदेव भगवान जी भी संसारी थे ,अनादि काल से वह भी संसार में भ्रमण कर रहे थे संसार के राग में रंगे थे, लेकिन जब उन्होंने अपने आत्म स्वरूप को जाना , पहचाना ,श्रद्धा की और जैसा आत्मा का स्वरूप है उसे वैसा जाना ,तब उसके लिए उन्होंने पुरुषार्थ किया कि इस संसार का राग रंग तो दुख देने वाला है संसार ही दुख मय है संसार में सुख नाम की कोई वस्तु नहीं है इसलिए उन्होंने उसको भली प्रकार से समझ कर अपनी आत्मा को और पर पदार्थों के स्वरूप को ठीक प्रकार से समझ कर आत्मा और पर् में भेद को ठीक प्रकार से जानकर स्व और पर का भेद किया तब आत्म केवल ज्ञान दीपक प्रकट हुआ।विषय और कषाय आत्मा का अहित करने वाले हैं ,संयम धारण करने से ही मुक्ति मिलेगी ।संयम एक अनुशासन है ,और वह आत्मा का अनुशासन है ।आत्मा का आत्मा के लिए जो अनुशासन होता है उसका नाम संयम है हमें अपनी आत्मा को परमात्मा बनाना है तो कम से कम जागृत रहकर आत्मा और शरीर के भेद को समझने का प्रयास करें।श्री आदिनाथ भगवान इस बात को जान गए उन्होंने पुरुषार्थ किया और पुरुषार्थ के बाद मोक्ष प्राप्त कर लिया ।संसारी प्राणी सुख समझ कर पदार्थ का संग्रह में लगे हैं ,भौतिक सुख साधन की सामग्री जुटाने में लगे हैं इसी को उन्होंने सुख मान रखा है किंतु यह सुख शाश्वत नहीं है। आचार्य श्री ने उदाहरण के माध्यम से बताया कि एक स्वर्णकार सोना निकालने की प्रक्रिया करता है सोने को बार-बार तपाता है ,अग्नि में तपा कर 16 ताव देकर उसमें से शुद्ध स्वर्ण प्राप्त कर लेता है इसी प्रकार तप की अग्नि में भगवान ऋषभदेव ने अपनी आत्मा को तप संयम साधना , तपस्या से आत्मा से कर्मों को पृथक किया तब केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके पूर्व तीर्थ क्षेत्र रक्षा कमेटी के अध्यक्ष रमेश मेहता, भूपेंद्र वालावत,सेठ राजमल अनुसार गुरुकुल मंदिर मे शांतिद्धारा पदम् जी पाटनी कलकत्ता द्वारा की गई निर्वाण लाडू मुदित जैन बेंगलोर निवासी उदयपुर परिवार द्वारा गुरुदेव के सानिध्य में गुरुकुल मंदिर में चढ़ाया। ऋषभ देव मंदिर में धनपाल दोवड़िया परिवार ने निर्वाण लाडू चढ़ाया । इस पावन अवसर पर सभी मंदिरों में निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।केसरियाजी मंदिर जी से जुलूस नेहरू बाजार पाटूना चौक से होते हुए पगलियाजी पहुंचा । पगलियाजी ।मे धर्म सभा हुई राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *