ज्यादा सोचना भी एक जहर है, जीने के लिए..क्योंकि बहुत मुश्किल है मरने तक, जिन्दा रहने के लिए..!अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज/

धर्म

ज्यादा सोचना भी एक जहर है, जीने के लिए..क्योंकि बहुत मुश्किल है मरने तक, जिन्दा रहने के लिए..!अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज/
कुलचाराम हैदराबाद

ज्यादा सोचना भी एक जहर है, जीने के लिए.
क्योंकि बहुत मुश्किल है मरने तक, जिन्दा रहने के लिए..!आदमी अपने मन और बुद्धि के कारण से ही परेशान और दु:खी है। आदमी का चंचल मन और ज्यादा बुद्धि होने की खुजलाहट ही जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा बनती जा रही है।

 

 

किसने सोचा था कि–?* हमारी बुद्धिमत्ता ने अपना कृत्रिम रूप बनाकर ही खतरा मोल ले लिया,, मतलब — बन्दर के हाथ में छुरी देना। आज 03 साल के बच्चे से लेकर, 93 साल तक के बुजुर्ग बाबा जी को मोबाइल की बीमारी ने कसकर पकड़ लिया है। इसलिए कह रहा हूँ कि आज भौतिक, आधुनिक, कृत्रिम संसाधनों ने,, हमारे घर, परिवार, समाज और देश की सुख शान्ति खत्म करके, आदमी को अमृत सा जहर देकर संस्कारों की हत्या, माता पिता के प्रति गैर जिम्मेदारी और सम्पूर्ण मानव जाति के लिए खतरा, एवं जीवन की सारी प्राइवेसी खत्म सी कर दी है।

आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई) का इस्तेमाल शुरू ही हुआ है, कि इसे लेकर तमाम तरह की चिन्तायें – आशांकाएं

 

 

सामने आने लगी है। जैसे ~ आज का आदमी चिन्ताओं से घिरा, कर्ज में डूबा, डाॅक्टर और वकील के जाल में फंसा और समय से पहले बुजुर्ग कर दिया और भौतिक, आधुनिक, कृत्रिम संसाधनों के गलत इस्तेमाल की चिन्ताओं व आशंकाओं ने आप हमको सोचने को मजबूर कर दिया कि —

राम जाने क्या होगा आगे…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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