*अन्तर्मना उवाच* (08 फरवरी!) मनुष्य जीवन अति दुर्लभ है। प्रसन्न सागर महाराज
ऐसा ही है जैसे कोई समुद्र में नहा रहा हो और उसके हाथ में खस-खस का एक दाना है। जैसे ही आँख में साबुन जाता है और वो खस-खस का दाना हाथ से छूट जाए। अब हम आप से कहें कि वो दाना खोजकर लाओ, तो शायद सौ जनम तक वो दाना मिलने वाला नहीं है। इससे भी कठिन है मनुष्य जीवन। इसका मूल्य वसूल कर ही यहां से जाना।
जीवन का मूल्य क्या है-?
अर्थी उठे — उससे पहले जीवन के अर्थ को जान लेना ही जीवन का मूल्य वसूलना है।

चिता जले —
उससे पूर्व अपनी चेतना को जगा लेना ही जीवन का मूल्य वसूलना है। 

अस्थियाँ बिखरे — उससे पूर्व परमात्मा के प्रति आस्था जगा लेना ही जीवन का मूल्य वसूलना है। 
अर्थी उठेगी, चिता जलेगी, अस्थियाँ बिखरेगी —
ये सब सुनिश्चित है फिर क्यों हम पागलपन का जीवन जी रहे हैं-?भारतीय व्यक्ति ही सबसे ज्यादा टाइम पास कर रहा है। जिससे पूछो — क्या कर रहे हो? एक ही जबाब मिलेगा — टाइम पास कर रहा हूं। या टाइम नहीं है और काम भी कुछ नहीं है। जिन्दगी के मूल्यवान पलों को व्यर्थ मत जाने दो। जीवन एक अमानत है। जीवन परमात्मा प्रदत्त एक उपहार है। ऐसा जीवन जियो जिससे इस उपहार* का उपहास ना हो।_जीवन की सबसे मूल्यवान चीज है आपका वर्तमान। जो एक बार चला जाये, तो फिर पुरी दुनिया की सम्पत्ति से ना वापिस ला सकते हैं और ना ही उसे खरीद सकते हैं। जीवन के हर लम्हें में प्रेम बहार है। खो दो तो मीठी यादे हैं और जी लो तो जिन्दगानी है। इसलिए –जिन्दगी एक सफ़र, है सुहाना..यहाँ कल क्या हो, किसने जाना…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
