नरसिंहपुर में 27 जैन मुनियों का हुआ संत समागम नगर के प्रथम जैन दीक्षित मुनि श्री निराश्रव सागर महाराज की दीक्षा उपरांत प्रथम बार हुआ नगर आगमन

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नरसिंहपुर में 27 जैन मुनियों का हुआ संत समागम नगर के प्रथम जैन दीक्षित मुनि श्री निराश्रव सागर महाराज की दीक्षा उपरांत प्रथम बार हुआ नगर आगमन
नरसिंहपुर
नगर के कंदेली दिगंबर जैन मंदिर में 27 मुनियों का संत समागम हुआ बुधवार की मंगल बेला में खेरी नाके पर समाज बंधुओ ने 20 मुनिराजो की मंगल आगवानी की, जब यह अगवानी हुई तो पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया था।

 

 

अगवानी की विशेषता
इस मंगल अगवानी की यह विशेषता रही की नरसिंहपुर नगर के प्रथम जैन दीक्षित मुनि श्री 108 निराश्रव सागर महाराज की दीक्षा उपरांत प्रथम बार हुआ नगर आगमन हुआ। जिसको लेकर सभी धर्म प्रेमी बंधु एवं नगर वासी पलक पावडे बिछाकर अगवानी करने हेतु आतुर रहे। समस्त मुनिसंघ को कंदेली दिगंबर जैन मंदिर लाया गया जहां उनकी मंगल आगवानी करते हुए मंगल आरती की।

 

निराश्रव सागर महाराज का भावुक उद्बोधन
पूज्य मुनि श्री निराश्रव सागर महाराज ने अपनी जन्मभूमि पर उद्बोधन देते हुए काफी भावुक दिखाई दिए और उन्होंने कहा कि जिस प्रकार नन्हे मुन्ने बच्चे को सभी दुलारने को आतुर रहते हैं, और उसकी तोतली भाषा को सुनने को आते रहते हैं। ऐसे ही नगर के सभी धर्म प्रेमी मेरे को सुनने के लिए आतुर है।

उन्होंने कहा कि नर्मदा नदी का अमरकंटक से उद्गम हुआ है, और वह निरंतर आगे बढ़ती हुई समुद्र में उसका समागम हो गया है। परंतु नर्मदा नदी के उद्गम स्थल से कहीं कुंड से जन्म होना बतलाते है, कहीं झरने के रूप में बतलाते है, नर्मदा नदी जैसे आगे बढ़ती है। जबलपुर वाले अपनी नर्मदा नदी कहते हैं, बरमान वाले अपनी, होशंगाबाद व ओंमकारेश्वर वाले अपनी नर्मदा बतलाते है, जबकि वास्तव में नर्मदा सभी के लिए जीवन दायिनी होकर सब कुछ देती है और आगे बढ़ती जाती है। इसी प्रकार साधु भी सभी जीवो को सब कुछ देता है नदी और साधु में कभी किसी प्रकार का कोई फर्क दिखलाई नहीं देता है।

निराश्रव सागर जी के प्रथम नगर आगमन पर यहां के धर्मालंबियों का उत्साह देखकर भाव विभोर हुआ आनंद सागर महाराज।
इस संत समागम में बोलते हुए मुनि श्री आनंद सागर महाराज ने कहा कि निराश्रव सागर जीके प्रथम नगर आगमन पर यहां के धर्मालंबियों का उत्साह देखकर भाव विभोर हुआ हम सब निराश्रव मार्ग पर हमेशा चलने की चेष्टा कर रहे हैं। हमें अपने जीवन का निराश्रव करना है।

जननी जन्मभूमि का वैभव स्वर्ग से बड़ा होता है विराट सागर महाराज।
इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री 108 विराट सागर महाराज ने भी अपनी वाणी से कृतार्थ करते हुए कहा कि अपनी जन्मभूमि का वैभव स्वर्ग से बड़ा होता है, जब अच्छा काम होना होता है, तो जिस माटी ने जन्म दिया है। जहां से कोई साधु निकल जाए तो लोग कितने भी व्यस्त हो, उनका ध्यान आकर्षित हो ही जाता है। जैन साधु की साधना के विषय में बोलते हुए महाराज श्री ने कहा कि जैन साधु की साधना प्रकृति से मिलती-जुलती है। देह में आत्मा तो है पर उसे परमात्मा बनने की निरंतर लालसा और लक्ष्य रहता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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