संदीप से बने आचार्य सुनील सागर आचार्य श्री के अवतरण दिवस पर भाव भीनी विनयांजलि
अनुशासन प्रिय साधना संयम के सुमेरु ज्ञान ध्यान में तप में लीनआचार्य भगवन सुनील सागर जी महाराज का हम आज अवतरण दिवस बना रहे है हम अपने को गोरावनवित व धन्य मानते है कि ऐसे आचार्य भगवन के काल मे हमने जन्म लिया उनकी आशीष उनकी करुणा हम सब पर मेह बनकर बरस रही है।
एक परिचय
मुनि कुंजर आचार्य श्री108 आदिसागर जी महाराज अंकलीकर के चतुर्थ पट्टाचार्य आचार्य भगवन 108 सुनील सागर जी महाराज श्री का जन्म अतिशय क्षेत्र तिगोदा जी जिला सागर में हुआ था।
आपका व बचपन का नाम संदीप था।आपके पिता का नाम भागचंदजी जैन और माता का नाम मुन्नी देवी था |आपके भाई का नाम प्रदीप और बहिन का नाम रानी है। आपकी शिक्षा किशनगंज जिला दमोह में हुई थी।आपने बी. कॉम. तक की शिक्षा ग्रहण की ।
आपकी मुनि दीक्षा गणेश प्रसाद वर्णी दिग. जैन विश्व विद्यालय बरुआ सागर जिला झासी में तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी के कर कमलों से हुई ।

मुक्ति पथ का प्रथम पायदान
आपने संसार चक्र मोह माया के बंधन से परे होकर लौकिक शिक्षा के पूर्ण होने के उपरान्त ब्रह्मचर्य अवस्था भरत सागर जी के पास जाकर धार्मिक शिक्षा ग्रहण की।औऱ मुक्ति पथ की और पायदान पायदान बढ़ते गए।
पद मोह नही त्याग तप की मूर्ति है आचार्य भगवान
तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी की महाराज समाधि के उपरान्त जन मानस के आचार्य पद के लिए निवेदन किया।तो उन्होंने कहा की मुझे पद नहीं चाहिए, अगर किसी और को चाहिए। तो उसे दे दीजिए ।इससे उनकी पद के प्रति विरक्ति साफ़ झलकती है। सचमुच पद मोह से मुक्त आचार्य भगवन साक्षात त्याग तप की मूर्ति है।
आप वात्सल्य के धनी है।समाज के कहने पर और सन्मति सागर जी द्वारा लिखित पत्र द्वारा आप को चतुर्थ पट्टाधीश के पद पर विराजित किया गया। और आप मुनि श्री सुनील से सागर जी से आचार्य श्री सुनील सागर जी बन गए।
पटाचार्य पद पर सुशोभित होने के बाद आचार्य श्री का भावुक उदबोधन
जब आचार्य भगवन को आचार्य आदिसागर जी महाराज अंकलीकर परम्परा का चतुर्थ पटाचार्य पद पर सुशोभित किया तब उनका प्रथम उदबोधन सभी को भावुक कर गया।
आपने आचार्य पद ग्रहण करने बाद प्रवचन में समाज को संबोधित करते हुए कहा की मैं इस आसन पर नहीं बेठना चाहता था यह आसन तपस्वी के तप से तपा हुआ है,मैं इस पर बैठकर अपना उत्तर दायित्व निभाउंगा। आज गुरुवर धर्म की ज्योति को पल्लवित्त किये हुए है। आपका तप त्याग संयम सचमुच देखते बनता है। आप तिरे पर तारिये ऐसे श्री आचार्य महाराज। आपने अनेको को त्याग तप की और अग्रसर करते मुक्ति के पद पथ पर अग्रसर करते हुए उनका कल्याण किया।
जीव जंतु भी आकर अपना कल्याण करते है।
गुरुवर की करुणा सचमुच अद्भूत है आप जीव दया परोपकार की प्रतिमूर्ति है ऐसे कही दृश्य और क्षण देखने को मिले हैं जब वन्य प्राणी आकर गुरुवर की आशीष लेते है। और उनकी मंगल वाणी का श्रवण करते है। कभी कछुआ, कभी चिड़िया,गुरूवर उनको सहज भाव से उन्हें हाथ मे लेकर णमोकार व धर्म का श्रवण कराते है।
अवतरण दिवस पर हम तो यही कामना करते है।
दीर्घायु हो पुर्णायु हो आप चिरायु हो
हम सबकी उम्र लग जाए आप शतायु हो
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी9929747312
