जिन्होंने आत्मा से कर्मों को पृथक कर आत्मा को कर्म रहित किया, वही अरिहंत कहलाते हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी         

धर्म

जिन्होंने आत्मा से कर्मों को पृथक कर आत्मा को कर्म रहित किया, वही अरिहंत कहलाते हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी     सलूंबर

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित सलूंबर विराजित हैं श्रीमती तारा सेठी कोलकत्ता जयपुर द्वारा आयोजित तीन दिवसीय स्वयंभू स्तोत्र चौबीसी जिन मंडल विधान के समापन अवसर पर धर्मसभा को संबोधित कर आचार्य श्री ने मंगल देशना में बताया कि धार्मिक विधान अनुष्ठान के माध्यम से कर्मों को नष्ट कर पुण्य अर्जित किया जाता है श्रद्धा आस्था विश्वास से एक दिन ऐसा आता है कि हमारे कष्ट और कर्म दूर होकर हम परमात्मा पद को प्राप्त कर सकते हैं इस विधान की सुंदर रचना मुनि श्री प्रभव सागर जी ने की। इसमें 24 भगवान की स्तुति , स्तवन कर पूजन भक्ति से कर्मों को नष्ट कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए। णमो अरिहंताण इस पद का अर्थ होता है, जगत के सभी अरिहंत परमात्माओं को में, नमस्कार करता हूँ, जिन्होंनेअपनी ,राग-देष प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करके अपने आत्मा के निजी गुणों को, निजी वैभव को जो कि ज्ञान दर्शन रूप है। उसको अवतरित करने वाले, बाधित करने वाले कर्मों का जिन्होने नाश करके इस पद को पाया है। ब्रह्मचारी गजू भैय्या ,राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि जगत के उन सब अरिहंतो को यहा नमस्कार किया गया है, जगत में रहने वाले प्राणियों के शत्रु भी होते हैं, मित्र भी होते है और जिनके जोवन से शत्रु और मित्र की भावना निकल जाती है। जिनके जगत के सभी पदार्थों के प्रति समान दृष्टि हो जाती है। जो दर्शन ,ज्ञान ,चारित्र की आराधना करते है। उसकी परिपालना कर पाते है वे इस पद को प्राप्त कर पाते है। जिन्होंने अपने भीतर ही बैठे कर्म शत्रुओ को जान लिया ,पहचान लिया कि शत्रु मेरी आत्मा से बाहर नहीं है। बाहर कोई मेरा शत्रु भी नहीं हो सकता है। मित्र भी नहीं बन सकता है। मेरी आत्मा पर स्थित कर्म रूपी पुदगल वो वही मेरा शत्रु हैं। ऐसे उन कर्म रूपी शत्रुओं को जानकर जिन्होंने उनका नाश कर दिया, कर्मों को अपनी आत्मा से पृथक कर दिया। कर्म रहित अपनी आत्मा को कर लिया। वे अरिहंत कहलाते है। और जब वे कर्म शत्रुओं को पृथक कर देते हैं तो फिर अपने परमात्म पद का लक्ष्य प्राप्त कर , वह संसारी भव्य आत्माओं के लिए वे पूजा के योग्य बन जाते हैं,पूज्य बन जाते है। इसलिए अरिहंत को हम अर्हंत भी कह सकते है। अर्हंत जो पूजा के योग्य होंगे,वे अरिहंत भगवान क्योंकि इन्होने संसार परिभ्रमण का बीज मोह राग और द्वेष को नष्ट कर दिया। श्री आदिनाथ पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के माता पिता श्री छगनलाल श्रीमती सज्जन देवी दोषी

एवम् धनपति कुबेर नरेश कुमार श्रीमती निर्मला देवी दोषी के निवास पर 17 जनवरी की रात्रि को महिला संगीत एवम् मेंहदी की रस्म आयोजित हुई।

18 जनवरी 2024 को प्रतिष्ठा के सौधर्म इंद्र मनोहरलाल एवम् शचि इंद्राणी श्रीमती संगीता ढालावत के निवास पर रात्रि को महिला संगीत एवम् मेंहदी की रस्म होगी। जिसमे सभी इंद्र परिवार एवम परिजन समाज जन सम्मिलित होगे।
राजेश पंचोलिया से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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