शिष्य के चरणों में आकर लौकिक शिक्षको ने किया नमन
सनावद
पूज्य मुनि श्री 108 प्रयोग सागर जी महाराज एवं प्रबोधसागर महाराज का अपनी जन्मभूमि सनावद में प्रवास चल रहा है। दोनों मुनिराजो का दीक्षा लेने के बाद प्रथम बार ही अपनी जन्म भूमि पर आगमन हुआ है।
वही एक ऐसा दृश्य परिलक्षित हुआ जब प्रबोध सागर महाराज के शिक्षको जिन्होंने उन्हें पढ़ाया उन्होंने आकर अपने शिष्य को नमन किया।




इन सभी का कहना था हमने ऐसे छात्र को शिक्षा दी जब वह विधार्थी था उस समय वह हमे प्रणाम करता था , आज हम उस छात्र को प्रणाम करने आये है । सभी शिक्षक गण अपने आपको गौराान्वित महसूस कर रहे थे.।. व्यक्ति कर्म से महान् बनता है ये मुनि श्री प्रबोध सागर जी ने मुनि बनकर बताया है ।
शुक्रवार की बेला में अष्टमी पर मुनिसंघ सानिध्य में भक्तामर महामंडल विधान किया गया जिसमें 48 अर्ध समर्पित किए गए। इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री ने कहा कि चित्त की शुद्धि हमारा परम अनिवार्य लक्ष्य है। चित्त की शुद्धि लिए आठ प्रकार के मंगल द्रव्य से पूजा करते हैं। आठ प्रकार के द्रव्य से जो पूजा करते हैं वह गृहस्थ होते हैं। जिनके पास धन उपार्जन करने की क्षमता होती है। अमुक लोग बिना द्रव्य की पूजन करते हैं। क्योंकि जब तक चित्त शुभ में नहीं होगा, तब तक शुद्ध की प्राप्ति नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा आप जब भी जो भी कार्य करे चाहे मंडल विधान हो, या पूजन हो, अभिषेक हो बहुत भक्ति भाव से करें तो वह हमेशा विशेष फलदाई होते ही है। इसलिए कहा जाता है कि प्रतिदिन जिनेंद्र देव के दर्शन शुद्ध भाव से करें।
इस अवसर पर मुनि प्रयोग सागर महाराज ने भी उद्बोधन देते हुए कहा कि संसार परिवर्तनशील है और उससे अधिक प्राणी का मन परिवर्तनशील है।उन्होंने मन को एकाग्र रखने की बात सभी से कहीं। और साथ बातों पर विशेष जोर दिया जिसमें प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन जरूर करें। प्रतिदिन जिनेंद्र देव का अभिषेक पूजन करें, अच्छे लोगों की संगति करें, अच्छे लोगों के गुणों को अपनाना, दूसरों के दोषों को नहीं देखना, हमेशा मीठा बोलो, सत्य बोलो, आत्म चिंतन जरूर करें। इन सात बातों का जो अनुसरण कर लेगा वह अपने मन को जीत लेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
