पुण्य और संस्कार के माध्यम से हमारे जीवन का हमारी आत्मा का कल्याण होता है मुनिश्री सुव्रतसागर महाराज
बीना
पूज्य मुनिश्री सुव्रतसागर महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि जैन ग्रंथो में कहां गया है कि जहां पर मंदिर ना हो वहां पर नहीं रहना चाहिए।
आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महाराज श्री ने कहा कि वर्तमान काल में भगवान तो मिलते नहीं उनकी मूर्तियां और उनके मंदिर मिलते है। इसलिए जहां पर मंदिर और मूर्तियां नहीं हो वहां पर नहीं रहना चाहिए। किंतु मंदिर हो,मूर्तियां हो, साधु संतों का आना-जाना ना हो वहां पर भी नहीं रहना चाहिए। क्योंकि भगवान से हमें पुण्य की प्राप्ति होती है। और साधुओं से हमें संस्कारों की प्राप्ति होती है।



महाराज श्री ने कहा कि पुण्य और संस्कार के माध्यम से हमारे जीवन का हमारी आत्मा का कल्याण होता है। अगर पुण्य और संस्कार दोनों नहीं होंगे तो हम कभी जीवन में तरक्की नहीं कर सकते हैं। जीवन में सफलता का मंत्र यही है कि भगवान की भक्ति करें और साधुओं का समागम करें। श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में महाराज श्री ने कहा कि जीवन में अगर आगे बढ़ना है तो संत समागम और भगवान की भक्ति करते रहना।
उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि किसी अवसर पर हमारे बुजुर्गों ने हमारे यहां बहुत सारे मंदिरों का निर्माण कराया। फिर भी अगर किसी भी तरीके से हम भगवान की भक्ति करने में पीछे ना रह जाए। इसलिए समाज के लोग मंदिर बनवाते जा रहे हैं, ताकि हम भगवान की भक्ति कर सकें। अगर हम इतनी सब व्यवस्थाएं मिलने के बाद भी भगवान की भक्ति न करें तो हमारा परम दुर्भाग्य होगा। अगर हम भगवान को मुख्य रूप से महत्व देगे, तो भगवान की कृपा से हमें भी हर जगह मुख्ता प्राप्त होगी। हम वास्तव में सब चीजों को प्राप्त करना चाहते हैं, किंतु भगवान की भक्ति किए बिना यह संभव नहीं है। क्योंकि पुण्य के प्रभाव से ही संसार के सारे वैभव प्राप्त होते हैं। अगर हम भगवान की भक्ति नहीं करेंगे तो हमें संसार की सुख सुविधाओं को प्राप्त करने में परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
महाराज जी ने कहा कि भगवान की भक्ति ऐसा कारण है जिसके माध्यम से हम हर प्रकार से संपन्न हो सकते हैं। मन, वचन, और काय से संपन्न बनने के लिए भगवान की भक्ति ही अमोध शस्त्र अस्त्र माना गया है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
