जैसे कार्य करेंगे,उस अनुसार पुण्य या पाप का अर्जन होंगा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

जैसे कार्य करेंगे,उस अनुसार पुण्य या पाप का अर्जन होंगा
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
सलूंबर
आध्यात्मिक संत शिरोमणी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित जैन बोर्डिंग में शीत कालीन प्रवास हेतु विराजित हैं
आयोजित धर्म सभा में वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने बताया कि पुण्य उदय से प्राप्त मनुष्य गति में उच्च तीर्थंकर प्रतिपादित जैन धर्म मिला है जैसे आप अच्छे या बुरे कार्य करेंगे उस अनुसार फल की प्राप्ति होगी कार्य करते समय जैसे परिणाम भाव होंगे वैसा फल मिलेगा दो दोस्त चर्चा कर एक सिनेमा जाता है,दूसरा धर्म सभा में जाता है, सिनेमा जाने वाला पश्चाताप करता है कि मुझे यहां पर नही आकार धर्म सभा में अच्छी ज्ञान की बात सीखना थी, इधर धर्म सभा में बैठा मित्र सोचता है कि मेरा मित्र सिनेमा का आनंद ले रहा होगा।काश मुझे भी वही पर जाना था।उसका मन धर्म सभा में नहीं लगा। यहा पर भाव और परिणाम के अनुसार सिनेमा जाने वाले ने पुण्य और धर्म सभा में जाने वाले को पाप मिला। इसलिए सभी को धार्मिक मंदिरों संत समागम में भाव एवम् परिणाम अच्छे रखना चाहिए

ब्रह्म.गजूभैय्या , राजेश पंचोलिया प्रभुलाल,सेठ लक्ष्मी चंद मनोहर ढालावत अनुसार आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व शिष्य आर्यिका 105 श्री विलोकमति माताजी ने उपदेश में बताया कि पंचकल्याण के में धार्मिक क्रिया के लिए पात्र बनकर पंच कल्याणक देखने का मंगल अवसर पुण्य के कारण प्राप्त होगा।

आर्यिका 105विलोकमती माताजी

 

कई जन्मों के असीम पुण्य से मानव जीवन मिलता है मानव जीवन में देव शास्त्र गुरु की भक्ति करने से सुख मिलता है साधु समागम में एक घड़ी अर्थात 6 मिनट 12 मिनट 24 मिनट का समय भी संत समागम में देते हैं तो आपको पुण्य की प्राप्ति होती है ,पाप का नाश होता है जीवन के तीन अवस्था बालक, यौवन, और जरा बुढ़ापा की अवस्था होती है।

           

 

आर्यिका माताजी ने कथानक के माध्यम से बताया कि एक गरीब व्यक्ति राजा के पास धन मांगने जाता है राजा उसे एक तहखाना में भेजता है जहां पर काफी सोना चांदी रहता है 3 घंटे का समय देते हैं कि 3 घंटे में आपको जितना भी धन लाना हो ला सकते हो वह तीन घंटे में गरीब व्यक्ति केवल धन को देखता रहता है समय पूरा हो जाता है राजा के सैनिक उसे वापस खाली हाथ ले आते हैं। राजा बोलता है कि ठीक है कल हमें तुम्हें एक मौका और देंगे दूसरे दिन फिर उसे मौका दिया जाता है हीरे जवाहरात ,रतन की खजाने में उसको भेजा जाता है वहां भी वह हीरे जवाहरात को देखता रहता है रत्न से बने खिलौने को देखता रहता है कुछ लाने का प्रयास नहीं करता और निर्धारित समय पूर्ण हो जाता है ।

     

 

पुनः उसे खाली हाथ वापस आना होता है राजा दया कर उसे उन्हें एक आखरी मौका देता है कि हम तुम्हें एक अवसर और देंगे इसके बाद कोई अवसर नहीं मिलेगा तीसरे दिन भी वह खजाने में जाता है और तांबे से बनी वस्तुओं को देखा है उसका मन चंचल होता है सामान बोरियों में भर लेता है किंतु उसका समय पूर्ण हो जाता है और पुनः उसे खाली हाथ आना होता है ।

 

 

आर्यिका माताजी ने कहा कि यही अवस्था मनुष्य जीवन की है भगवान ने आपको बालक अवस्था, यौवन अवस्था, और बुढ़ापा दिया है आप सोचते हैं कि हम समय बहुत है बाद में धर्म ध्यान कर लेंगे समय बीतने पर ना तो वह श्रावक बन पाता है, ना अणुव्रती बनता है ना ही महाव्रती बन पाता है और जीवन ऐसा ही व्यर्थ चले जाता है।

         

 

 

कथा के माध्यम से माताजी ने बताया कि समय मूल्यवान है समय का सदुपयोग देव शास्त्र गुरुओं के सानिध्य में प्रतिदिन देव दर्शन,अभिषेक पूजन, स्वाध्याय करना चाहिए।इससे पुण्य की प्राप्ति होगी। स्वाध्याय से ज्ञान मिलता है जैसे आप कार्य करेंगे उस अनुसार अच्छा या बुरा फल मिलेगा।
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

 

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