मनुष्य जीवन का सार चारित्र :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुन्सी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुन्सी (राज.) में विराजमान भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न विज्ञाश्री माताजी की सुविज्ञ शिष्या आर्यिका विकक्षा श्री माताजी का विहार सवाईमाधोपुर से गुन्सी के लिये हो गया है । आगामी 10 दिसम्बर 2023 को सहस्रकूट विज्ञातीर्थ में होने वाले पिच्छीका परिवर्तन एवं 108 फुट उत्तुंग कलशाकार सहस्रकूट जिनालय के भव्य शुभारंभ के आयोजन में सम्मिलित होने के लिए । पूज्य गुरु माँ के सानिध्य में संघस्थ आर्यिकाओं का दीक्षा दिवस मनाया गया ।
पूज्य माताजी ने सभी को मंगल उद्बोधन में दीक्षा का महत्व प्रतिपादित करते हुए कहा कि – दीक्षा का अर्थ जो दीनता , दानवता व दरिद्रता का क्षय करें वह दीक्षा कहलाती है ।

मोह से मोक्ष की ओर कदम बढ़ाने का नाम है दीक्षा । राग से विराग की ओर बढ़ने का नाम है दीक्षा ।।




अविज्ञा से विज्ञा की प्राप्ति का नाम है दीक्षा । जिस प्रकार फूलों का सार इत्र होता है उसी प्रकार मनुष्य जीवन का सार चारित्र होता है । संयम और चारित्र के बिना मनुष्य पर्याय की कोई कीमत नहीं है । मनुष्य पर्याय को सार्थक करने के लिए संयम रूपी रत्न की आवश्यकता है । जैसे डॉक्टर के बिना अस्पताल बेकार है , टीचर के बिना स्कूल बेकार है , नमक के बिना भोजन बेकार है , ब्रेक के बिना कार बेकार है उसी प्रकार संयम के बिना मनुष्य जीवन बेकार है । द्वय आर्यिका माताजी ने गुरु गुणगान गाते हुए कहा कि – गुरु के बिना जीवन निःसार है ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
