निर्यापक श्रमण सुधा सागर महाराज संघ का 14 वर्ष बाद कमला नगर में हुआ मंगल प्रवेश
आगरा
निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव108 श्री सुधासागर जी महाराज संघ का मंगल प्रवेश कमला नगर आगरा की पावन धरा पर 14 वर्ष के लंबे अंतराल बाद आज हुआ। जिस मंदिर जी का पंचकल्याणक गुरुदेव के सानिध्य में हुआ था उसी मंदिर जी में आज मंगल प्रवेश हुआ महाराज श्री एमडी जैन जैन मंदिर से विहार करके नेहरू नगर सुल्तानगंज की पुलिया होते हुए विकास मार्केट पर से भव्य जुलूस के साथ जहां पर समस्त ग्रेटर कमला नगर भव्य स्वागत के लिए मोजूद थी उनके साथ गुरुदेव का प्रवेश हुआ मार्ग पर लाइव रंगोली बनती हुई दिखाई दी सभी महिला मंडल अपने हाथों में कोई झंडे कोई मोर की वेश भूषा में भारी उत्साह सब में दिखाई दिया प्रवचन सभा का शुरुआत मंगलाचरण नृत्य से हुआ पीएनसी परिवार द्वारा पाद प्रक्षालन किया गया
राहुल रोहित आलोक जैन अहिंसा परिवार द्वारा शास्त्र भेट किया गया ग्रेटर कमला नगर के तीनों मंदिरों की समाज डी 19 शालीमार कर्मयीगी के श्रेष्टियो द्वारा श्रीफल भेट किया गया। मंच संचालन मनोज जैन बाकलीवाल जी के द्वारा किया गया।
इसी दौरान धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सुधासागर महाराज कहा कि पहली बात तो तुम इतना देखकर सावधानी से चलो कि काँटा लगे ही नही, लेकिन काँटा लग जाने के बाद अब एक काँटा और लाओ।

दोनो काँटे में अंतर है- एक जो अबुद्धि, प्रमाद, अज्ञानतापूर्वक लगता है वो काँटा दुःख देता है, दूसरा काँटा हमने खोजा है, जिस काँटे को हमने खोजा वो काँटा दुःख नही देता बल्कि दुःख को दूर करके सुखी करता है।

तुम संसार मे रहकर इतने कांटे लगा लेते हो कभी क्रोध का, कभी मान, माया या लोभ का। इतने काँटे लगा लेते हो उनको निकालने के लिए हमे ये मन्दिर रूपी काँटा बनाना पड़ता है।

जिनेंद्र देव को सिद्धालय से उतरकर यहाँ आना पड़ता है। दूसरे काँटे को बड़ी सावधानी से खोजते है।



पाप, विनाश अशुभ कार्य के लिए कोई सावधानी नही चाहिए, वो तो हो जाते है लेकिन अशुभकार्य करने के बाद जो बन्ध होता है और उसके फल की जब बारी आती है, तब व्यक्ति को लगता है मेरे अशुभकर्म का परिहार हो। इसलिए जिनवाणी माँ ने, गुरुओं ने आप लोगो के मकानों के बीच मे जिनेंद्रदेव भगवान को हमेशा के लिए बैठाल दिया। कुछ रास्ते ऐसे होते है जिनमे कांटे लगेंगे ही लगेंगे, जब काँटा लगना निश्चित है तो निकालने वाला काँटा भी पहले से जेब मे रख लो न देव- शास्त्र- गुरु की गृहस्थ संगति करता है इसलिए नही कि उसे मोक्ष जाना है, इसलिए करता है मैं जिस संसार मे रह रहा हूँ उसमे सुख पूर्वक रहूँ। धर्म को अपन जब देते है तो दुनिया मे घोषणा करते है और धर्म हमे जब देता है तो कानो भी खबर नही देता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
