अध्यात्म के यात्री होने पर जीवन की यात्रा पूर्ण होती है आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
धर्म कमाने से जीवन उन्नत बनेगा धर्म को आकुलता से नहीं कर विवेक पूर्वक निराकुलता से भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन करना चाहिए विवेक से पुण्य का अर्जन होगा।
यात्री दो प्रकार के होते हैं एक यात्री जो संसार में परिभ्रमण करते हैं दूसरे यात्री वह होते हैं जिन्होंने अध्यात्म की यात्रा पूर्ण कर सिद्ध भगवान तीर्थंकर हो गए हैं उन्हें भगवान के रूप में आप जिनालय में स्थापित करते हैं।।





अध्यात्म के यात्री होने पर जीवन की यात्रा पूर्ण होती है इसलिए प्रीति धर्म से करना होगा तभी मन में जागृति चेतना आएगी ।मन में जागृति चेतना हमें देव शास्त्र गुरु की शरण प्राप्त करने से मिलेगी तभी जीवन में परिवर्तन का संदेश मिलेगा वर्तमान में आप सभी धर्म को भूल जाते हैं जिनालय से भी धर्म का संदेश मिलता है किंतु आप ग्रहण नहीं करते हैं धर्म से प्रीति कर करने पर धर्म की क्रिया करना चाहिए जैसा शास्त्रों में लिखा है वैसी क्रिया करेंगे तो संसार के आवागमन से आप मुक्त हो सकते हैं इसके लिए आपको विषयों से हटने कषाय, कर्म हटाना होंगे तभी यात्रा पूर्ण होगी आचार्य श्री ने बच्चों को संस्कारित करने के लिए प्रेरणा दी।

यह प्रवचन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने अशोकनगर में नूतन वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव के उपलक्ष्य में धर्मसभा में प्रकट किए।

श्री अशोक गोधा रोशन लाल चितोड़ा ने बताया कि सकल दिगम्बर जैन समाज अशोक नगर द्वारा आयोजित 2 दिवसीय कार्यक्रम में नूतन वेदी पर 1008 श्री कुंथुनाथ भगवान और 1008 श्री अरहनाथ भगवान सहित पुरानी वेदी में विराजित श्री जी पुण्यार्जक परिवारों द्वारा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सानिध्य में संहिता सूरी पंडित हँसमुख जी शास्त्री धरियावद के निर्देशन में 2 नवंबर को विराजित हुए।
इस अवसर पर वेदी पर कलशारोहाण के साथ ध्वजारोहण किया गया।
इस अवसर पर समाज के काफी लोगों ने उपस्थित होकर धर्म लाभ लिया।
राजेश पंचोलिया वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
