परम पूज्या प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका विज्ञमति माताजी के दीक्षा दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति

धर्म

परम पूज्या प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका विज्ञमति माताजी के दीक्षा दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति
आज का वह पावन दिन जो कोटा के इतिहास का स्वर्णिम दिन कहा जाएगा।

 

 

आज के दिन विजयदशमी वर्ष 2008 जब संपूर्ण विश्व की निगाहें कोटा के गुमानपुरा मल्टीपरपज स्कूल पर थी। हो क्यों ना वहा इस युग की सर्वाधिक दीक्षा प्रदात्री गणिनी आर्यिका 105 विशुद्ध मति माताजी द्वारा दीक्षाएं प्रदान की गई थी। दीक्षा के स्वर्णिम पलो को मैंने स्वयं साक्षात देखा था।

उन दीक्षा के क्षणों में विलक्षण प्रतिभा की धनी जो यथा नाम तथा गुण को सार्थक करती हैं ब्रह्मचारिणी आभा दीदी जो संयम पथ पर बढ़ते हुए निश्चित रूप से धर्म की आभा को बढ़ा रही थी। और उन्होंने धर्म के पद पर बढ़ते हुए पूज्य गुरु मां की निश्रा में रहते हुए धर्म और नियम संयम को जाना आगे बढ़ते हुए वर्ष 2008 विजयादशमी के पावन पर्व पर उन्हें नारी का सर्वोच्च पद आर्यिका दीक्षा इस युग की महान साधिका आर्यिका 105 विशुद्धमति माताजी द्वारा प्रदान की गई। और उन्हें नाम दिया गया आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी।

वर्ष 2008 से पूज्य आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी ने संयम के पद पर बढ़ते हुए जैन धर्म की प्रभावना को एक उच्चतम शिखर पर पहुंचाया है। उन्होंने नियम संयम के साथ अपनी मानव देह को तो धन्य किया ही, साथी साथ ही साथ उन्होंने पूज्य गुरुमां विशुद्ध मति माताजी की अनंत सेवा की जो अपने आप में एक अनुपम उदाहरण है। शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण यदि हमें देखना है तो वह पूज्य माताजी में साफ देखने को मिलता है।

पूज्य गुरु मां द्वारा जो इन्हें नाम दिया गया है वह निश्चित रूप से सार्थकता वाला नाम है पूज्य माताजी निश्चित रूप से विशिष्ट ज्ञान की धारी हैं। और दूर दृष्टि वाली है। मैं तो कहूंगा कि मुझे तो धर्म की प्रभावना की और अग्रसर करने के लिए पूज्य माताजी ने ही प्रेरित किया। इसी का ही परिणाम रहा की उन्होंने अपने दृढ़ परिश्रम धार्मिक ज्ञान एवं उनके साथ में संलग्न अन्य माताजी को भी उन्होंने हमेशा साथ रखते हुए धर्म साधना की ओर आगे बढ़ाया जिसका परिणाम यह हुआ कि पूज्य माताजी ने उन्हें पट्ट गणिनी पद से भी सुशोभित किया। जो पूज्य माताजी भली-भांति निभा रही है। हम तो यही कामना करते हैं कि पूज्य माताजी आप दीर्घायु हो, आपका रत्नत्रय और फलीभूत हो।

 

 

 

पूज्य माताजी के गुरु मां के प्रति समर्पण भाव को हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि जब वर्ष 2018 में पूज्य माता जी का दीक्षा दिवस कोटा में मनाया जा रहा था तब माताजी ने जो शब्द गुरु मां की प्रति भाव विहल होकर के कहे थे उन्हें सुनकर और पढ़कर यही लगेगा कि एक शिष्य का गुरु के प्रति कितना अनुराग एवं विनय भाव है। वह भाव आप सभी के समक्ष
परम पूज्या प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका विज्ञामति माताजी के दीक्षा दिवस पर भाव भीनी अभिव्यक्ति
आज का वह पावन दिन जो कोटा के इतिहास का स्वर्णिम दिन कहा जाएगा।

आज के दिन विजयदशमी वर्ष 2008 जब संपूर्ण विश्व की निगाहें कोटा के गुमानपुरा मल्टीपरपज स्कूल पर थी। हो क्यों ना वहा इस युग की सर्वाधिक दीक्षा प्रदात्री गणिनी आर्यिका 105 विशुद्ध मति माताजी द्वारा दीक्षाएं प्रदान की गई थी। दीक्षा के स्वर्णिम पलो को मैंने स्वयं साक्षात देखा था।

उन दीक्षा के क्षणों में विलक्षण प्रतिभा की धनी जो यथा नाम तथा गुण को सार्थक करती हैं ब्रह्मचारिणी आभा दीदी जो संयम पथ पर बढ़ते हुए निश्चित रूप से धर्म की आभा को बढ़ा रही थी। और उन्होंने धर्म के पद पर बढ़ते हुए पूज्य गुरु मां की निश्रा में रहते हुए धर्म और नियम संयम को जाना आगे बढ़ते हुए वर्ष 2008 विजयादशमी के पावन पर्व पर उन्हें नारी का सर्वोच्च पद आर्यिका दीक्षा इस युग की महान साधिका आर्यिका 105 विशुद्धमति माताजी द्वारा प्रदान की गई। और उन्हें नाम दिया गया आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी।

वर्ष 2008 से पूज्य आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी ने संयम के पद पर बढ़ते हुए जैन धर्म की प्रभावना को एक उच्चतम शिखर पर पहुंचाया है। उन्होंने नियम संयम के साथ अपनी मानव देह को तो धन्य किया ही, साथी साथ ही साथ उन्होंने पूज्य गुरुमां विशुद्ध मति माताजी की अनंत सेवा की जो अपने आप में एक अनुपम उदाहरण है। शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण यदि हमें देखना है तो वह पूज्य माताजी में साफ देखने को मिलता है।

पूज्य गुरु मां द्वारा जो इन्हें नाम दिया गया है वह निश्चित रूप से सार्थकता वाला नाम है पूज्य माताजी निश्चित रूप से विशिष्ट ज्ञान की धारी हैं। और दूर दृष्टि वाली है। मैं तो कहूंगा कि मुझे तो धर्म की प्रभावना की और अग्रसर करने के लिए पूज्य माताजी ने ही प्रेरित किया। पूज्य माताजी बढ़ती चली गई बढ़ती चली गई और पूज्य गुरु मां विशुद्ध मति माताजी ने उन्हें पट्ट गणिनी पद प्रदान किया। यही
कामना करते हैं की माताजी आपका संयम एवं रत्नत्रय और बढ़ता रहे और बढ़ता रहे।

एक शिष्य का गुरु के प्रति कितना विनय भाव होता है यह पूज्य आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी में परिलक्षित होता है। उन्होंने वर्ष 2018 में अपने दीक्षा दिवस जो कोटा में आयोजित हुआ था तब उन्होंने जो भाव प्रस्तुत किया वह इस बात की सार्थकता सिद्ध करता है कि एक शिष्य का गुरु के प्रति क्या भाव है और कितना विनय है। वह भाव थे। उन्होंने कहा था
निष्प्रह साधिका आर्यिका विज्ञमति माताजी अपने दीक्षा दिवस गुरु माँ गणिनी आर्यिका 105 विशुद्व माताजी के प्रति कुछ पंक्तिया के द्वारा विनयांजलि दी वह सभी के ह्रदय को छु गयी
पंक्तिया
इस चेतना की तीर्थ को गुरु माँ संभालिये आई हु तेरी शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये
गुरु ही शिष्य के लिये मज़बूत ढाल है गुरु के बिना उस शिष्य पर उठते सवाल है
कर्म चक्र चक्षु से हमको निकालिये आई हु शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये
मेरा स्वभाव जल की भाति शुद्ध हो निर्मल सत्य शील क्षमा करुणा मन मे हो प्रबल
गुरु माँ मुझे अपने शासन मे पालिये आई हु शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये
गुरु शिष्य का सबंध ही शुभ का प्रबंध है गुरु का आचरण ही शिष्य के लिये सुग्रंथ है
किंचित क्रपा की डोर मेरी और डालिये आई हु शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये
गुरु द्वार है दीवार नहीं शिष्य के लिये जिनकी नसीहते हमे शिवमार्ग के लिये
बचपन से लेके आजतक के क्षण सजा दिये आई हु शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये
इस चेतना के तीर्थ को मंदिर मे ढालिये आई हु शरण मे इसे मंदिर मे ढालिये

पूज्य गुरु मां के चरणों में परिवार सहित कोटि कोटि नमन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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