संस्कारित प्राणियों के लिए दीक्षा संसार परिभ्रमण से मुक्त होने का मार्ग है दीक्षा से ड्रेस,एड्रेस, भोजन बदल जाता है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
उदयपुर
दीक्षा से सबको भय लगता है जबकि दीक्षा संसार परिभ्रमण से मुक्त होने का निष्प्रही मार्ग है। संसारी व्यक्ति परिभ्रमण कर दौड़ लगा रहे हैं यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होगी , आपने अनेक भव में भ्रमण किया है इस संसार से आपको अनुराग हो गया है और जिसे अनुराग होता है वह उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं । बिरले पुण्य शाली व्यक्ति ही असीम पुण्य उदय से परिवार के संस्कार मिलने पर पुरुषार्थ कर संसार का परिभ्रमण से दौड़ समाप्त करते हैं। छगनलाल जी ने संस्कार दिए घर पर चेत्यालय स्थापित किया, साधु संगति से धर्म का पालन किया । पहले स्वयं संस्कारित किया ,फिर परिवार को संस्कारित करने का पुरुषार्थ किया। और यह अनुकूलता गुरुओं के सानिध्य में रहने से प्राप्त होती है यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणि श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने नूतन आर्यिका श्री योगी मती पूर्व ब्रह्मचारिणी मंजू दीदी के दीक्षा अवसर पर धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में आगे बताया कि मंजू दीदी आचार्य श्री अजीत सागर जी के संघ सानिध्य में रही उनसे शिक्षा प्राप्त कर उनमें वैराग्य का बीजारोपण हुआ आचार्य श्री अजीत सागर जी के संस्कारों का प्रतिफल का योग ने उन्हें आर्यिका योग मति माताजी बना दिया।
आचार्य श्री ने आगे बताया कि योग आने पर वैराग्य का प्रसंग मिलता है क्योंकि संसार में सुख नहीं है मोह की प्रबलता के कारण दुख का एहसास संसारी प्राणी को नहीं होता है ,गुरु सानिध्य से ही दीक्षा और शाश्वत सुख के योग बनते हैं दीक्षा से दुख से सुख की और अध्यात्म मार्ग पर गुरु सानिध्य से सिद्धालय जाने की राह मिलती है।



दीक्षा का आशय आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त करना है तभी आपकी यात्रा परमात्मा बनने के लिए पूर्णता को प्राप्त होती है दीक्षा से ड्रेस ,एड्रेस ,लंच बदल जाते हैं आप नीचे से ऊपर उठकर मंच पर साधुओं की साथ शामिल हो जाते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
