जहां भरोसा, आस्था, वहां सुख शांति आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज

धर्म

जहां भरोसा, आस्था, वहां सुख शांति आचार्य श्री सुबल सागर जी महाराज
चण्डीगढ़

दिगम्बर जैन मंदिर सेक्टर 27बी मे सोमवार सायं कालीन भक्ताम्बर स्त्रोत के माध्यम से दीप अर्चना करने का सौभाग्य श्री मान धर्म बहादुर जैन सपरिवार चंडीगढ़ को प्राप्त हुआ, इस अवसर पर परम पूज्य गुरुदेव श्री आचार्य सुबल सागर महाराज ने कहा कि यह भगवान की आराधना, भक्ति व दीप अर्चना करने का सौभाग्य सभी को नहीं मिलता है। जब तक पुण्य उदय में नहीं होगा तब तक तो मंदिर जाने के भाव [परिणाम] ही नहीं हो सकते व्यक्ति के आज अपन लोग यह स्वयं अनुभव कर रहे हैं लोगों को दुनियाँ में इतने काम है कि वह पाप में लगा रहता है यह पाप कर्म उसे उस स्थान तक जाने ही नहीं देता जहाँ सुख- शांति है। लेकिन यह मनुष्य सुख शांति की तलाश में दिन रात एक करता हुआ सारा समय नष्ट कर देता है फिर भी वह उसे प्राप्त नहीं है क्योंकि जो चीज जहाँ है वह वहाँ पर ही मिलेगी,यहाँ वहाँ से प्राप्त करने का हम कितना पुरुषार्थ कर ले सफलता मिलने वाली नहीं है।

 

 

 

हमारे वीतरागी भगवान भक्तों को कुछ नहीं देते, न ही वह बादाम, लोंग, चावल चढ़ाने की कहते है, और न ही गरीब-अमीर लोगों के बीच भेद-भाव (पक्षपात) करते है। बस इनके पास जो श्रद्धा, विश्वास, आस्था, भरोसा से भर कर आते है और पूर्णतः समर्पण कर देता भगवान के चरणों में अपने को बस। यही समर्पण उसे भक्त से भगवान बना देता है। यहाँ ‘सुख-शांति-आनंद है।


यह आस्था की डोर दिखती नहीं, परंतु अंतरंग का दृढ़ बंधन है जो हमें प्रभु से जोड़कर रखती है। कषाय भावों के तीव्र होने पर व्यक्ति की आस्थाएँ नष्ट हो जाती है, कषाय के मंद उदय में ही आस्था के होने पर हमें एक पत्थर में भी भगवान नजर आते है। हमें अगर अपनी आस्था को सुरक्षित रखना है तो कषायों को मन्द रखना होगा क्योंकि कषाय विष के समान है जो हमारी आस्था के प्राण को संकट में डाल देती है।


जहाँ व्यक्ति की आस्था विद्यमान रहती है वहाँ गुण ही गुण दृष्टिगोचर होते हैं और जहाँ पर आस्था नहीं है वहाँ गुणों का समुदाय होने पर भी दोष ही दिखाई देते हैं, इसलिए सर्व गुणों में प्रधान गुण आस्था है। आस्था के अभाव में किसी भी गुणों का गुणगान नहीं किया जा सकता है। जहाँ आस्था होती है वहाँ ही प्रीति उत्पन्न होती है और जहाँ प्रीति रहती है वहाँ सुख शांति
स्वयमेव उत्पन्न हो जाता है। जहाँ अप्रीति है वहाँ दुखी है। दुखी प्राणी (व्यक्ति) आस्था को जीवित नहीं रख पाता है। जितनी गहरी आस्था होगी उतना ही गहरा आनंद होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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