स्वच्छ दृष्टि से निहारो, सृष्टि सुन्दर दिखेगी विशुद्ध सागर महाराज
बड़ौत
आचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में सम्बोधन करते हुए कहा की*” ढंग का जीवन जियो, ढोंग मत करो। सहज, सरल जीवन ही श्रेष्ठ जीवन है।
दिखाने का जीवन व्यक्ति का दिवालिया निकाल देता है। असहज, बनावटीपना अशांति को जन्म देता है। सहजता पूर्ण जीवन सुखद आनन्दित होता है। वर्तमान में जागृतिपूर्ण जीवन ही भविष्य में श्रेष्ठ हो सकता है।”
उन्होंने कहा प्रभु। दर्शन, गुरु दर्शन से परिणाम विशुद्ध होते हैं। यह एक रासायनिक क्रिया है। भव्य-जीव जब भक्ति से भरकर भक्ति करता है, तो गुरू प्रसन्नता पूर्वक शुभाशीष देते हैं। समझो, भक्ति की शक्ति को समझो।
भक्ति परम्परा से मुक्ति का साधन है। भक्ति पूर्व-संचित कर्मों का क्षय करने वाली है। भक्ति स्वर्गादिक की सम्पत्ति को प्रदान करने वाला है। क्रिया की प्रक्रिया को समझो। जिसे हम शब्दों में कह नहीं पा रहे, उसे अनुभूति से समझो। दृष्ट को भी समझो, अदृष्ट को भी समझो।
जो अदृष्ट को समझ लेता है, वह संतापित नहीं होता है। जो अदृष्ट को जान लेगा, वह कष्ट के आने पर भी दुःखी नहीं होगा। कार्य के कारण पर भी दृष्टि ले जाओ। कारण के बिना कार्य नहीं होता है। शत्रु में भी शत्रु मत देखो, शत्रु में भी भविष्य का भगवान् देखो। बीज में भी वृक्षत्व को निहारो। बूँद में सागर निहारो। आत्मा में परमात्मा को निहारो। दृष्ट्रि को विशाल करो। दृष्टि विशाल होगी, तो सृष्टि भी स्वच्छ, निर्मल और पवित्र दिखाई देगी।
‘भोगों का आनन्द भिन्न है, संगीत का आनन्द भिन्न है, भ्रमण का आनन्द भिन्न है, परन्तु शान्त-चित्त से बैठकर आत्मानुभूति का आनन्द भिन्न है। हैरान-परेशान मत होना, नियतता को भी निहारो। नियतता की नियति को कोई नहीं राल सकता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
