तेंदुखेड़ा
श्री मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव के दूसरे दिवस की बेला में श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। मध्यान बेला में यज्ञ मंडल एवं पंचकल्याण विधान के अर्घ समर्पित किए गए।
वही प्रातः मांगलिक बेला में निर्यापक श्रमण मुनिश्री समय सागर महाराज ने मांगलिक उदबोधन में कहा कि अपने परिणामों के माध्यम से कर्मों का आश्रय होता है, लेकिन वह कर्म इतने सूक्ष्म होते हैं कि दृष्टिगत नहीं हो पाते हैं। सूक्ष्म कर्म वह हुआ करते हैं, जो अपने ही रागद्वेष के साथ आत्मगत परिणामों के द्वारा उनका सबंध आत्मा के साथ होता है। जिसको बंध बोलते हैं। नहीं चाहते हुए भी उन कर्मों का आश्रव होता रहता है। कर्म बंध से बचना है तो आगम का अवलोकन करना अनिवार्य होता है।
आचार्य श्री की महिमा का बखान किया अकंपमति माताजी ने
आर्यिका रत्न अकंपमति माता ने गुरु आचार्यश्री विद्यासागर महाराज की महिमा और कृपा के सबंध में बताते हुए कहा कि पूज्य ज्ञान सागर महाराज ने उनका नाम ही विद्या सागर ऐसा दिया है जिसमें ज्ञान और विद्या में कोई अंतर नहीं हुआ करता है। ज्ञान और विद्या एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। जिनालय का कार्य संपन्न होने के पश्चात यह पंचकल्याणक महोत्सव को परिपूर्ण करने की शक्ति नहीं थी, लेकिन ऐसी गुरुवर की कृपा हुई कि हम सभी को ज्येष्ठ श्रेष्ठ प्रथम निर्यापक मुनिश्री समय सागर महाराज का ससंघ सानिध्य प्राप्त हुआ है, जिन्होंने हमारे दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर दिया है। हम सभी कृत-कृत हुए हैं।
इस अवसर पर मुनि श्री प्रशस्त सागर जी महाराज ने
कहा संस्कारों की भूमि बनाने के लिए उस संस्कार को देने वाली माता को सबसे पहले संस्कारित होना बहुत आवश्यक है। क्योंकि जब वह ही संस्कारित नहीं होगी तो हमारे जीवन में संस्कार कहा आएगा। जिसके पास जो होता है उसी का वह दान कर सकता है। यदि माता और पिता संस्कारित नहीं है तो आप कभी संस्कारित नहीं हो सकते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
