इंसान कहता मेरा है लेकिन धन तो नही कहता है कि में मुनि श्री
घाटोल
वासुपूज्य दिगंबर जैन मंदिर मे आचार्य विद्यासागर महाराज के
शिष्य मुनि विमल सागर ,मुनि अनन्तसागर , मुनि धर्मसागर,मुनि श्री भावसागर महाराज के सानिध्य में एवं ब्रह्मचारी रजनीश भैया रहली के निर्देशन में दशलक्षण महापर्व उत्तम आकिंचन्य धर्म के अंतर्गत मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुई प्रश्नोत्तर रत्नमालिका की परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया, अनंत चतुर्दशी गुरुवार को प्रातः 6 बजे मूलनायक श्री वासुपूज्य भगवान के मोक्षकल्याणक पर 1008 कलशों से महामस्तकाभिषेक एवं विश्व का प्रथम निर्वाण लाडू अर्पण किया जाएगा ,16 ,10 उपवास करने वालो का सम्मान किया जाएगा ।
इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि विमल सागर महाराज ने कहा कि तू तीन लोक का नाथ बन सकता है यदि इस धर्म को अंगीकार कर ले तो, दान में धन लग जाता है तो भला हो जाता है ,प्रभु के वैभव को जो राजाओं से भी ज्यादा जो बढ़ाता है उसको वैसा ही फल मिलता है, स्वर्ण ,रजत आदि के पात्र से अभिषेक ,शांतिधारा ,पूजन करना चाहिए स्टील के पात्रो से नही,सोने की सामग्री से पूजन करू यह भावना प्रतिदिन भाना चाहिए, जैसी भावना आराध्य के प्रति करोगे वैसा ही फल मिलेगा,अनंत चतुर्दशी के दिन ऐसा दृश्य दिखेगा जो कभी किसी ने देखा नही होगा।

मुनि भावसागर महाराज ने कहा कि जहां कुछ भी नहीं है वहां आकिंचन्य धर्म है ,शरीर आदि पर पदार्थों को अपना नहीं मानना, मेरा कुछ भी नहीं है, ज्ञान की शक्ति और वैराग्य का बल दोनों एक ही साथ मोक्ष की सिद्धि करते हैं, परिग्रह के त्यागी जीव लोक में दुर्लभ है, दान रहित जिस व्यक्ति का धन आता है उस व्यक्ति का धन जंगल के फूलों की भांति निरर्थक है, दान से हीन बहुत धन व्यर्थ है,इंसान कहता है ये जमीन मेरी है ,संपत्ति मेरी है ,धन मेरा है,लेकिन पैसा तो कभी नही कहता है कि में तुम्हारा हुँ, कितनो ने उसका आदर किया तिजोरी में संभाल कर रखा फिर भी वह नही कहता है कि में तुम्हारा हूँ।


लेकिन मनुष्य कहता है पैसा मेरा है और में इसका मालिक हुँ जोड़ने वाला नही खाली करने वाला सौभाग्यशाली होता है, अग्नि परीक्षा के बाद बने घी से आरती बनती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
