उत्तम विचार से जीवन में सार्थकता आती है विमर्श सागर महाराज।
जतारा
आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का पालन किया जाता है तो छोटे बड़े का भेद मिट जाया करता है। उत्तम विचार रखने से जीवन में सार्थकता आने लगती है।
भौतिक साधनों से दूर रहने की बात करते हुए महाराज श्री ने कहा कि जो जितना बाहर भौतिक साधनों से जुड़ेगा।
वह उतना ही अशांत होगा। शांति की अनुभूति एकांकी स्वभाव में होती है। जितने भी पर पदार्थ होते हैं वह है अशांति पैदा करने वाले होते हैं। व्यक्ति इसमें जितना बढ़ता चला जाता है वह उतना अशांत और अशांति की ओर चल जाता है। पर पदार्थ से बचना चाहिए यह लोभ का सबसे बड़ा कारण है। सुखी अभिलाषा में अपनी पूरी जिंदगी तिजोरी भरने में लगा देता है। और सांस रूपी संपदा भी समाप्त हो जाती है। और जहां आत्मा में संतोष आ जाता है बस उसी समय से आनंद जीवन में घटित होने लग जाता है। जब तक व्यक्ति पाप नहीं छोड़ेगा तब तक वह धर्म की तरफ नहीं जा सकता।


महाराज श्री ने कहा कि जीवन मन मस्तिष्क में उच्च विचार लाने पर ही जीवन सफलता की ओर बढ़ेगा। और मन में पुण्य कार्य में जाने लगेगा। सबके प्रति समभाव रखना चाहिए। आत्मा का स्वभाव निर्लोभी होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
