अन्तर्मना उवाच* (23 सितंबर विशेष)सत्य मेरा कांच सा था..न जाने कितनों को चुभ गया..!*
एक हद के बाद इंसान सब कुछ छोड़ देता है –शिकायत करना, मिन्नते करना, किसी को मनाना, और फिर मन ऐसा हो जाता है, कि फिर कोई बात करे या ना करे,, कोई देखे या ना देखे,, फिर कोई सुने या ना सुने,, कोई आये या ना आये,, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि तब तक पता लग चुका होता है, कि ये दुनिया झूठ को ही सुनती है, और मतलब से ही मुस्कुराती है।
उत्तम सत्य का अर्थ है
– मौन हो जाना।* सत्य को शब्दों का जामा नहीं पहनाया जा सकता है। आज मोबाइल के इस दौर में, सिर्फ असत्य का व्यापार, सम्बन्ध और रिश्ते निभाये जा रहे हैं। *90 प्रतिशत लोग – मोबाइल पर असत्य बोलते हैं।* मैं कैसे आपको सत्य का उपदेश दूं-? *सत्य पर बोलना ही सबसे बड़ा असत्य है।



मैं इसलिए मौन हूँ — ताकि सत्य का पालन और एहसास कर सकूं।* सत्य कड़वा उनको लगता है जिनका मन झूठ से भरा होता है। सच का पता हो तो झूठ सुनने में बड़ा मजा आता है। स्वयं से झूठ बोलना दुनिया का सबसे बड़ा पाप है। *उत्तम सत्य धर्म कहता है – कि दूसरों के बारे में उतना ही बोलो, जितना हम खुद के बारे में सुन सकें।*
???? दुध को स्वादिष्ट बनाना है, तो शक्कर चाहिए।
???? भोजन को स्वादिष्ट बनाना है, तो नमक चाहिए।
???? गाड़ी से मन्ज़िल तक जाना है, तो ब्रेक चाहिए, और
???? जीवन को मधुर बनाना है, तो वाणी, व्यवहार और अच्छी सोच होना चाहिए।
*उत्तम सत्य धर्म की जय* ????????????
