शुचि के भाव पवित्रता को शौच धर्म कहते है
आज उत्तम शौच धर्म का दिन है शौच अर्थात शुचि के भाव पवित्रता को शौच धर्म कहते है पवित्रता किसे कहते है विजातीय वस्तु के मैल से अपवित्रता आ जाती है और उसके हट जाने पर वस्तु पवित्र हो जाती है इसी तरह यह आत्मा द्रव्य कर्म और नौ कर्म का संयोग होने के कारण जो यह उसकी पर अवस्था है आत्मा में राग देष आदि विभाव से हटकर आत्मा विशुद्धि ज्ञानपात्र हो जाये अर्थात अपने स्वभाव में आ जाये उसके पवित्र आत्मा कहते है लोभ का मन से दूर होना शौच धर्म कहलाता है हमें अपने जीवन में लोभ नही करना चाहिए क्योंकि जो लोभ करता है उसकी नीच गति होती है कहा भी है लोभ पाप का बाप बखाना अर्थात की लोभ ही पाप का बाप है जिस व्यक्ति के मन में लोभ आ जाये तो उसका जीवन ख़राब हो गया उसका जीवन पाप में पढ़ गया हे भव्य आत्मा अपने जीवन को पहचान इस लोभ से बच और अपनी आत्मा को लोभ रहित कर एक कर्तव्य भगवान आत्मा बनाओ तभी तेरा जीवन सार्थक है।


एक कहानी
इसे कहानी के माध्यम से समझेंगे
एक व्यक्ति सभी विधाओं में पारगामी हो कर अपने घर आया वो उसकी स्त्री ने उससे एक प्रश्न पूछा की बताओ पाप का बाप कौन है वह उत्तर नही दे पाया और कहने लगा की मेरे गुरु जी ने मुझे सब विधाएं सिखाई पर यह बात नही बताई और वो इसका उत्तर जानने के लिये अपने गुरु के पास चल पड़ा बनारस दूर था रात अधिक हो चुकी थी वह एक जंगल में जा पंहुचा वहां देखा की अब में कहा जाऊं और वह एक सीढ़ी पर जा कर सौ गया सुबह होते ही वह उठा और जब वह जाने लगा तो एक स्त्री घर से निकली उठा और जब वह जाने लगा तो एक स्त्री घर से निकली बोली कहा जा रहे हो वह बोला मैं अपने गुरु के पास जा रहा हूँ उन्होंने मुझे सारी विधाएं सिखाई पर मेरी पत्नी ने मुझ से एक प्रश्न किया है उसका उत्तर लेने जा रहा हूँ वो वैश्या पूछती है क्या पूछा है मुझे भी बाताओ तो वो पंडित जी बताते है,पाप का बाप कौन है वह स्त्री बोली अच्छा सेठ जी आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिल जायेगा आप यहाँ ही ठहरिये सेठ जी उसे पूछते है आप कौन है तो वह बोली मैं एक नगर बधु हूँ सेठ जी बोलते गुस्से की तुम मुझे यहाँ ठहरने के लिये बोल रही हो तुम से बात करने मैं और तुम्हारी सीढ़ी पर सोने से मुझे पाप लग गया अब इसका मुझे प्रायश्यचित करना पड़ेगा तो वह बोली सेठ जी यह लीजिए 10 अशर्फियां और जो आपको पाप लगा है उसका प्रायश्यचित कर लीजिये और आप मेरी कुटिया मैं ठहर जाइये जिसे यह मेरी कुटिया पवित्र हो जाएगी वह सेठ लोभ मे उसके घर चला जाता है। और वैश्या भोजन करने को को बोलती है और 10 अशर्फी के लोभ में वह सेठ भोजन के लिये हाँ कर देता है पर सेठ बोलता है जब सेठ भोजन करने बैठता है तब वेश्या बोलती है सेठ जी में 20 और दूंगी बस मेरे हाथ से एक बार भोजन कर लो तो सेठ बोलता है की 20 आश्रफिया और मिलेगी इतने में तो मेरी पूरी जिंदगी निकल जाएगी तो भी नही कमा पाउँगा और एक निवाले की तो बात है कौन मुझे देख रहा है वो उसके हाथ से जब निवाला खाता है तब वह वैश्या एक थपड लगाती है और बोलती है सेठ यही है लोभ पाप का बाप तुमने लोभ में आकर अपने धर्म को बेच दिया।अपने ज्ञान का उल्लघन कर लोभ मेंआकर अपने धर्म को बेच दिया। अरे सेठ में तो नगर बधु हूँ में तो हूँ पापी पर आपको इतना ज्ञान होकर आपने यह गलती कैसे की धिकार है।वैसे भी जब जब लोभ बढ़ता है तब तब आत्मा में अशुद्धता बढ़ती है और जब अशुद्धता बढ़ती है तब तब आत्मा का पतन निश्चित है हे भव्य आत्मा हमको तो भावना भानी चाहिए की विषय कषायों को मैं त्यागु तजु प्ररिगृह को मोक्ष मार्ग पर बढ़ता जाऊं नाथ अनुग्रह हो तन पिंजर से मुझे निकालो सिद्धांलय घर दो मेरा अंतिम मरण समाधी तेरे दर पर हो।हम सबकोयही भावना भानी चाहिए इसलिए अपने जीवन मैं शौच धर्म अपनाए। अपने जीवन को ऊचाई तक लेकर जाये कभी भी ऐसे लोभ मैं ना फसे की आपकी आत्मा का पतन हो और आप भी संसार में भटकते रहे जीवन बहुत अनमोल है व्यर्थ ना जाने दे।
जय बोलो उत्तम शौच धर्म की जय
बा ब्र झिलमिल दीदी
