छोटे बड़ो से पूछकर कार्य करे तो छोटो की शक्ति बढ़ती है और बड़े छोटो से पूछकर काम करे तो दोनो की शक्ति घटती है और सबसे ज्यादा शक्ति घटती है छोटो की : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर महाराज

धर्म

छोटे बड़ो से पूछकर कार्य करे तो छोटो की शक्ति बढ़ती है और बड़े छोटो से पूछकर काम करे तो दोनो की शक्ति घटती है और सबसे ज्यादा शक्ति घटती है छोटो की : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर महाराज

आगरा

छोटे बड़ो से पूछकर कार्य करे तो छोटो की शक्ति बढ़ती है और बड़े छोटो से पूछकर काम करे तो दोनो की शक्ति घटती है और सबसे ज्यादा शक्ति घटती है छोटो की : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर महाराज

आगरा

हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में निर्यापक श्रमण मुनिपुगंव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो कुछ दुनिया में अच्छा लगता है वह अच्छा ही होगा उसका परिणाम अच्छा होगा कुछ निश्चित नही है।

 

 

 

 

जो कार्य हमे बुरे लगते है,उनका फल बुरा ही होगा ये कोई निश्चित नही है। कितनी बाते है जो हमे अच्छी लगती है लेकिन बाद में जाकर वो बड़ी कष्टदायी हो जाती है,हमे पछताना पड़ता है, प्रतिक्रमण करना पड़ता है। वह प्रतिक्रमण जो करना पड़ता है वही हमारी सबसे बड़ी भूल हुई है कि हम कंही न कंही सत्य को पहचानने में चूक गए तो दुनिया में इसलिए गार्जियन की जरूरत पड़ती है। इसलिए आवश्यकता पड़ती है माँ की क्योंकि बेटे को जो कुछ अच्छा लग रहा है वो बेटा नही जान सकता है कि वह अच्छा ही है। हर व्यक्ति को अपने आपको इस संसार मे मूर्ख, अज्ञानी मानना चाहिए क्योंकि संसार मे रहने वाला व्यक्ति कोई भी इतना ज्ञानी हो ही नही सकता कि उसे हमेशा सत्य का ही ज्ञान होगा। हम मुनियों से कहा कि अपने आपको पूर्ण जानकर मत मानना कि मेरे से गलती हो ही नही सकती। जिस दिन बड़े आदमी तुमसे क्षमा माँग ले उससे बड़ा दुर्भाग्य तुम्हारा हो ही नही सकता। बेटा नाराज न हो जाये गर मैं ये बोली ले लूँ तो यदि किसी पिता के मन मे भाव रहा है तो मैं बेटो से कहना चाहता हूँ तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा दुर्भाग्य का बीजोरोपण हो गया। जितना पुण्य था सब भस्म हो गया क्योंकि उनके मन मे भय आ गया बेटे का भाई का। आपके घर मे कोई भी कार्य करने से पहले बड़े लोग पूछते है तो आपको कैसा लगता है, अच्छा लगता है तो आपका विनाश निश्चित है, महानुभाव इसको सौभाग्य नही दुर्भाग्य समझना। ये बताओ लड़की वाला बड़ा होता है या लड़की वाला बड़ा होता है तो पूर्वजो ने कहा कि जो कन्या तुम्हारे घर मे वधु बनेगी जो कन्या इस घर के लिए कुलदीपक देगी, तुम्हारी गृहस्थी को आगे बढ़ाएगी| कितने ही बड़े तुम क्यों न हो, जहाँ तुम्हे कन्या पसंद है वहाँ खुद जाकर के लेके आओ वो नही आएगी। सम्मान के साथ लेके आओ जिससे तुम्हारी कुल परम्परा चलना है, अहंकार मत करो। ये परम्परा इतनी अच्छी परम्परा थी और ये आजकल परम्परा इतनी गन्दी परम्परा हो गयी कि आज लड़के वाले अपने नगर में, घर में बुलावाकर के विवाह आदि करते है। देने वाले में भी कन्या का अपमान है। जो दरवाजे आकर लेके जाएगा, उसी को कन्या देना, ये बेटी का विवाह है और जाकर उसे सौप देना ये भार है सौभाग्य नही, निपट गयी चलो ले जाओ,ऐसे नही दिया जाता। आज भी अच्छे जो घर है, नही हम बेटी को लेने आएंगे, चाहती तो राजुल नेमिनाथ के लिए द्वारिका जा सकती थी लेकिन नही नेमिनाथ को भी द्वारिका जाना पड़ा। बहुओ सुनो यदि तुम्हारी सासु तुमसे डरती है,तुमसे पूछे बिना कुछ कर तो लेवे। यदि ये अहंकार तुम्हे आ रहा है तो समझ लेना तुम्हे नीच गोत्र का बन्ध हो रहा है, तुम संसार के सबसे निकृष्ट स्थान पर जन्म लेयोगी क्योंकि तुमने बड़ो के द्वारा सम्मान पाने की बात सोची थी। छोटे बड़ो से पूछकर कार्य करे तो छोटो की शक्ति बढ़ती है और बड़े छोटो से पूछकर काम करे तो दोनो की शक्ति घटती है और सबसे ज्यादा घटती है छोटो की। भिखारी भूख मिटाने के लिए भोजन मांगने जाता है और साधु मुनिव्रत पालन करने के लिए आहार करने जाता है रत्नत्रय पालन करने के लिए जाता है। तुमने चौका लगाया है, महाराज के आहार हो या न हो लेकिन तुम्हारे खाते में महाराज को आहार कराने का पुण्य मिलेगा, मिलेगा। तुम्हे हताश होने की जरूरत नही है।

शुभम जैन ने बताया की धर्मसभा
से पूर्व मनीष जैन गुजरात परिवार द्वारा मुनिश्री का पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट किया,साथ ही संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया| इसके बाद महिलाओं ने मंगलाचरण की प्रस्तुति दी। इस दौरान आगरा दिगंबर जैन परिषद,श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति एवं श्री दिगंबर जैन शिक्षा समिति के पदाधिकारियों ने मुनिश्री के चरणों में श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया|
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में निर्यापक श्रमण मुनिपुगंव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो कुछ दुनिया में अच्छा लगता है वह अच्छा ही होगा उसका परिणाम अच्छा होगा कुछ निश्चित नही है।

जो कार्य हमे बुरे लगते है,उनका फल बुरा ही होगा ये कोई निश्चित नही है। कितनी बाते है जो हमे अच्छी लगती है लेकिन बाद में जाकर वो बड़ी कष्टदायी हो जाती है,हमे पछताना पड़ता है, प्रतिक्रमण करना पड़ता है। वह प्रतिक्रमण जो करना पड़ता है वही हमारी सबसे बड़ी भूल हुई है कि हम कंही न कंही सत्य को पहचानने में चूक गए तो दुनिया में इसलिए गार्जियन की जरूरत पड़ती है। इसलिए आवश्यकता पड़ती है माँ की क्योंकि बेटे को जो कुछ अच्छा लग रहा है वो बेटा नही जान सकता है कि वह अच्छा ही है। हर व्यक्ति को अपने आपको इस संसार मे मूर्ख, अज्ञानी मानना चाहिए क्योंकि संसार मे रहने वाला व्यक्ति कोई भी इतना ज्ञानी हो ही नही सकता कि उसे हमेशा सत्य का ही ज्ञान होगा। हम मुनियों से कहा कि अपने आपको पूर्ण जानकर मत मानना कि मेरे से गलती हो ही नही सकती। जिस दिन बड़े आदमी तुमसे क्षमा माँग ले उससे बड़ा दुर्भाग्य तुम्हारा हो ही नही सकता। बेटा नाराज न हो जाये गर मैं ये बोली ले लूँ तो यदि किसी पिता के मन मे भाव रहा है तो मैं बेटो से कहना चाहता हूँ तुम्हारी जिंदगी में सबसे बड़ा दुर्भाग्य का बीजोरोपण हो गया। जितना पुण्य था सब भस्म हो गया क्योंकि उनके मन मे भय आ गया बेटे का भाई का। आपके घर मे कोई भी कार्य करने से पहले बड़े लोग पूछते है तो आपको कैसा लगता है, अच्छा लगता है तो आपका विनाश निश्चित है, महानुभाव इसको सौभाग्य नही दुर्भाग्य समझना। ये बताओ लड़की वाला बड़ा होता है या लड़की वाला बड़ा होता है तो पूर्वजो ने कहा कि जो कन्या तुम्हारे घर मे वधु बनेगी जो कन्या इस घर के लिए कुलदीपक देगी, तुम्हारी गृहस्थी को आगे बढ़ाएगी| कितने ही बड़े तुम क्यों न हो, जहाँ तुम्हे कन्या पसंद है वहाँ खुद जाकर के लेके आओ वो नही आएगी। सम्मान के साथ लेके आओ जिससे तुम्हारी कुल परम्परा चलना है, अहंकार मत करो। ये परम्परा इतनी अच्छी परम्परा थी और ये आजकल परम्परा इतनी गन्दी परम्परा हो गयी कि आज लड़के वाले अपने नगर में, घर में बुलावाकर के विवाह आदि करते है। देने वाले में भी कन्या का अपमान है। जो दरवाजे आकर लेके जाएगा, उसी को कन्या देना, ये बेटी का विवाह है और जाकर उसे सौप देना ये भार है सौभाग्य नही, निपट गयी चलो ले जाओ,ऐसे नही दिया जाता। आज भी अच्छे जो घर है, नही हम बेटी को लेने आएंगे, चाहती तो राजुल नेमिनाथ के लिए द्वारिका जा सकती थी लेकिन नही नेमिनाथ को भी द्वारिका जाना पड़ा। बहुओ सुनो यदि तुम्हारी सासु तुमसे डरती है,तुमसे पूछे बिना कुछ कर तो लेवे। यदि ये अहंकार तुम्हे आ रहा है तो समझ लेना तुम्हे नीच गोत्र का बन्ध हो रहा है, तुम संसार के सबसे निकृष्ट स्थान पर जन्म लेयोगी क्योंकि तुमने बड़ो के द्वारा सम्मान पाने की बात सोची थी। छोटे बड़ो से पूछकर कार्य करे तो छोटो की शक्ति बढ़ती है और बड़े छोटो से पूछकर काम करे तो दोनो की शक्ति घटती है और सबसे ज्यादा घटती है छोटो की। भिखारी भूख मिटाने के लिए भोजन मांगने जाता है और साधु मुनिव्रत पालन करने के लिए आहार करने जाता है रत्नत्रय पालन करने के लिए जाता है। तुमने चौका लगाया है, महाराज के आहार हो या न हो लेकिन तुम्हारे खाते में महाराज को आहार कराने का पुण्य मिलेगा, मिलेगा। तुम्हे हताश होने की जरूरत नही है।

शुभम जैन ने बताया की धर्मसभा
से पूर्व मनीष जैन गुजरात परिवार द्वारा मुनिश्री का पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट किया,साथ ही संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया| इसके बाद महिलाओं ने मंगलाचरण की प्रस्तुति दी। इस दौरान आगरा दिगंबर जैन परिषद,श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति एवं श्री दिगंबर जैन शिक्षा समिति के पदाधिकारियों ने मुनिश्री के चरणों में श्रीफल भेंटकर आशीर्वाद प्राप्त किया|
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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