आचार्य शिरोमणी वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका 105 महायशमती माताजी ने उदयपुर में केशलोचन किया ।

धर्म

आचार्य शिरोमणी वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज की शिष्या आर्यिका 105 महायशमती माताजी ने उदयपुर में केशलोचन किया ।
उदयपुर

वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज अपना संयम वर्ष का 55 वां चातुर्मास हूमड़ भवन तेलीवाड़ा में कर रहे हैं आज अनेक श्रद्धालुओं के समक्ष्य आर्यिका 105 श्री महायशमति माताजी ने केश लोचन किया ।

 

 

 

केश लोचन के विषय में आर्यिका 105श्री वत्सलमती माताजी ने दी जानकारी
केशलोचन के बारे में संघस्थ आर्यिका 105 श्री वत्सलमती माताजी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 माह से 4 माह की अवधि के भीतर केशलोचन करना अनिवार्य है केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है । केश लोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है। केशलोचन की प्रक्रिया में केश्लोचन करते समय केवल राख का उपयोग किया जाता है जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है केशो का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवो की उत्पत्ति होने की संभावना होती है जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं। बाल हाथों से इसलिए उखाड़े जाते हैं कि बालों को कटिंग करने के लिए सेविंग कराने के लिए अन्य द्रव्य की आवश्यकता होती है जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं बाल सौंदर्य का प्रतीक हैं इससे राग और आकर्षण होता है। केश एललोच से शरीर से ममत्व दूर होता है केशलोचन के समय तप,संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है।

जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं उस दिन उपवास करते हैं ।केश लोचन देखकर अनुमोदना करने से पुण्य की प्राप्ति होती है कर्मों की निर्जरा होती है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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