बन्धुओ मर जाना लेकिन उस स्थान पर मत जाना जिसे स्थान पर माँ-बाप का डर लगे : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
आगरा
आगरा के हरीपर्वत स्थित श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में निर्यापक मुनिपुगंव श्री सुधासागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन को संबोधित करते हुए कहा कि सृष्टि का सत्य ऐसा है जो अपनी समझ से परे होता है, कुछ महापुरुषों की क्रियाएं ऐसी है जो सामान्य जन के लिए आश्चर्यकारी होती है। माँ की हर क्रिया बेटे को बुरी लगती है, बेटे जिसे खाना चाहता है माँ उसे ही खाने के लिए मना करती है, माँ-बेटे का सामंजस्य नही बैठ पा रहा है, सामंजस्य तो बैठेगा लेकिन तब तक तुम माँ के हाथ से निकल चूके होंगे। तुम अपने जीवन को आँसूओ के साथ व्यतीत कर रहे होंगे और जब समझोगे तब माँ भी चली जायेगी। अधिकार जीवन भर के लिए नही मिलते कुछ अधिकार टेम्परेरी भी होते है। जैसे जैसे बेटा बड़ा होता जाता है माँ का अधिकार क्षेत्र व कर्तव्य कम होते जाते है। विवाह के बाद माँ का अधिकार प्रायः खत्म ही हो जाता है क्योंकि तुम उसकी किसी बात को मानने तैयार नही होते। ऐसी ही स्थिति हमारी जिनवाणी माँ के साथ है, ये माँ भी मनोरंजन के लिए मना करती है लेकिन जिनवाणी माँ दुखदायी जान पड़ती है। हमे महाराज से भी डर लगता है जबकि डरा तो डाकू से जाता है। तुम्हे वो सारे कार्य करने की छूट है जिसमे तुम्हे मम्मी- पापा का डर तो नही लग रहा है, ऐसा कौन सा पाप है जो सारी दुनिया को पता चल जाये इसका गम नही है, डर किसका है मम्मी पापा को पता नही चलना चाहिए, महानुभाव बहुत करुणा करके कह रहा हूँ उस पाप को यही छोड़ देना, यही तुम्हारे लिए सबसे बड़ा अहितकारी महापाप है।
मीडिया प्रभारी शुभम जैन ने बताया कि महाराज श्री ने कहा कि
जो कार्य आपको करते समय माँ-बाप का डर लगने लगे जाए और तुम करोगे उसी समय निधत्ति निकाचित तुम्हे कर्म का बन्ध होता है। बन्धुओ मर जाना लेकिन उस स्थान पर मत जाना जिसे स्थान पर माँ-बाप का डर लगे और वहाँ खूब जाना जहाँ माता-पिता को तुम पर फक्र होने लगे। हमने ऐसे लोग देखे है जो अपने बेटे को देखकर माँ-बाप को उन्हें स्वयं को बदनसीब मानते थे, लेकिन जो शिविर से लौटने के बाद कहते है कि ऐसे बेटे को पाकर मैं धन्य हो गया। जिनसे तुम्हारे सम्बन्ध है उनको तुमसे सम्बन्ध बनाते समय गर्व महसूस होना चाहिए। कभी तुम्हारे माता-पिता को लगे कि मैंने कितना पुण्य किया जो मुझे सुपुत्र मिला तो महानुभाव तुम जिंदगी में कई भवो तक अनाथ नही बनोगे। क्या तुम्हारा भाई को तुम पर गर्व हो रहा है यदि हाँ तो जाओ तुम्हे ऐसे भाई मिलेंगे जैसे राम और लक्ष्मण। जहाँ वनवास राम को होगा और साथ मे जाएगा लक्ष्मण। कांटा तुम्हे लगेगा, आँसू भाई को आएगा। और तुम्हे पाकर कभी भाई ने कहा होगा मैंने ऐसा कौन सा पाप किया जो मुझे ऐसा भाई मिला उसी का अभिशाप है कि तुम्हे भाई तो मिलेगा लेकिन उसमे प्रेम नही होगा, दुश्मनी होगी। इसलिए ऐसा कार्य करो कि तुम्हारा भाई तुम पर गर्व करे| तुम्हारे सम्बन्धो में तुमने जो अच्छा बुरा किया सब माफ कर दिया जाएगा बस ये बताओ क्या तुम्हारी पत्नी को तुम पर गर्व है जो मुझे ऐसा पति मिला। गर तुम्हारी पत्नी मायके में जाकर ये कहे कि माँ तुमने मुझे किस घर मे भेज दिया। सासु नही है डायन है, पति पति नही है नरक है। ओरिजनल कहा निकालेगी आवाज अपनी माँ के सामने। बस वो अभिशाप है कि अब तुम्हारे भव भवान्तर तक तुम संयमी बनोगे नही,

मित्र की, सगे सम्बन्धी की परीक्षा संकट में होती है। बनाओ ऐसे सम्बन्ध कि भगवान को तुम पर गर्व हो जाये कि मैं ऐसे भक्तों का भगवान हूँ। छोटा चाहे तो बड़ो को पूजवा सकता है और छोटा चाहे तो बड़ो को धूल में मिलवा सकता है, बड़ो के हाथ मे कुछ नही होता। बड़े कितनी ही इज्जत कमाले लेकिन छोटा बड़ो की इज्जत धूल में मिला देगा। तुम्हे भगवान को पाकर के क्या लाभ हुआ मुझे ये नही सुनना है, मुझे इतना सुनना है तुम्हें पाकर के मन्दिर को क्या लाभ हुआ है, तुम्हे पाकर भगवान का क्या यश बढ़ा। लोग तुम्हे देखकर कहे कि जिसका भक्त ऐसा है उसका भगवान कैसा होगा बस ये अर्जित करना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
