शिल्पा सबद्रा रामगंजमंडी ने इतने बड़े आघात के बाद बड़े ही धैर्य से अपने आपको खड़ा किया यह सभी के लिए प्रेरणादायक है ।

धर्म

शिल्पा सबद्रा रामगंजमंडी ने इतने बड़े आघात के बाद बड़े ही धैर्य से अपने आपको खड़ा किया यह सभी के लिए प्रेरणादायक है ।
रामगंजमंडी
विगत कुछ दिनो पूर्व सेवा भावी युवा शुभम जैन सबद्रा की एक दुर्घटना में निधन हो गया लेकिन ऐसे भीषण समय शुभम की धर्मपत्नी शिल्पा सबद्रा रामगंजमंडी ने इतने बड़े आघात के बाद भी बड़े ही धैर्य से अपने आपको खड़ा किया यह सभी के लिए प्रेरणादायक है ।

 

 

 

शिल्पा ने सम्मेद शिखरजी स्थित गुणायतन में इस विषय को लेकर पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज से एक प्रश्न किया कि मां बाप हमें सब कुछ बताते हैं सब कुछ सीखाते हैं पाप कर्म धर्म कर्म अच्छाई बुराई लेकिन जीवन की सत्यता से हमें वाकई नही कराते जैसे कि मैं कुछ दिन पूर्व मौत के मुंह से निकली हूं अपनों को खोया है। बची हुई जो जिंदगी है उसको कैसे सार्थक करें। और ऐसी “हार्ड सिचुएशन” को हम कैसे संभाले। ताकि हम अपना भविष्य ऊंचा कर सके।

 

 

महाराज श्री ने शंका का समाधान करते हुए बताया कि कर्म का उदय कभी भी किसी के साथ भी आ सकता है। जिसके हृदय में धैर्य और क्षमता होती है वह रह जाता है। और जिसके जीवन में भय और आकुलता होती है वह बह जाता है।

महाराज श्री ने सराहना करते हुए कहा कि तुमने कर्म की इतनी गहरी प्रगाढ़ता की मार धैर्यता के साथ सहा है और में तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम और समर्थ होकर अपने जीवन को आगे बढ़ाओ । 6 माह पूर्व तुमने अपनो को खोया खुद भी मौत के मुंह से बाहर आई हूं।

मैं चाहूंगा की तुम अपना अनुभव और लोगों तक भी सांझा करो ताकि और लोग भी प्रेरणा पा सके ।
महाराज श्री ने भाव भरे शब्दों में कहा कि हम बच्चो को पुण्य पाप की बाते, अच्छे बुरे की बातें तो बता देते हैं लेकिन अपने बच्चों को जीवन की वास्तविकता का ज्ञान क्यों नहीं करवाते हैं? यही सबसे बड़ी विडम्बना है। हम जिंदगी भर लोगों को झूठ ही सिखाते है, और झूठ में ही जिंदा रखते है। जिस दिन सच दिखा दे और सच सिखा दे उसे दिन उनके जीवन की राह बदल जाएगी। हमे जीवन के सत्य को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि बचपन में बच्चों को 12 भावना रटाई जाती है, “राजा राणा छत्रपति हाथिन के असवार, मरना सबको एक दिन अपनी अपनी बार” लेकिन सिखाई नहीं जाती। जिस समय यह बात रटाई जाए उसे समय ही वास्तविकता का बोध करा दिया जाए तो व्यक्ति अपनी चेतना के प्रति जागरूक होगा। उसकी प्रवत्ति में व्यापक बदलाव होगा। हम लोग परिभाषा रटने मात्र को धर्म चेतना मान लेते है, लेकिन उसका उसे बोध हो ताकि जीवन के झंझावतों में भी अपने को स्थिर रख सके। और जीवन के क्रम को आगे बढ़ा सके। और तुम्हे पुनः आशीर्वाद और परिवार को भी आशीर्वाद दुख की इस खड़ी में समता भाव रखा। शिल्पा ने भावुक हृदय से कहा कि कहा की पूरी तरह से मैं स्वस्थ नहीं हूं लेकिन भावना योग के द्वारा मुझे बहुत कुछ मिला है और प्रयास भी कर रही हूं।
निश्चित रूप से ऐसी संकट की घड़ी में खड़े होना सभी के लिए एक आदर्श और एक प्रेरणा देता है। विषम परिस्थितियों में भी अपने आप को सम बनाने का प्रयास करना चाहिए।

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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