आत्मा को स्वस्थ रखना जीवन का अंतिम उद्देश्य होता है सुव्रत सागर महाराज
बीना
नगर के शांतिनाथ जिनालय में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सुयोग शिष्य मुनिश्री 108 सुव्रत सागर महाराज ने शरीर के साधना पर ध्यान देने की बात पर ध्यान दिलाया।
महाराज श्री ने कहा कि स्वास्थ्य दो प्रकार का हुआ करता है एक शारीरिक और एक आत्मिक शारीरिक स्वास्थ्य को चिकित्सा पद्धति के द्वारा ठीक किया जाता है। जबकि आत्मिक स्वास्थ्य को आध्यात्मिक एवं धर्म के द्वारा ठीक किया जाता है। आत्मा को स्वस्थ रखना जीवन का अंतिम उद्देश्य होता है। लेकिन उस तक पहुंचाने के लिए शरीर को स्वस्थ रखना आवश्यक है। क्योंकि धर्म और आध्यात्मिक का साधन शरीर ही होता है।
महाराज श्री ने कहा कि स्वास्थ्य प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से आध्यात्मिक तक पहुंचने का प्रयास किया जाता है। शरीर तो शरीर होता है वह आधी,व्याधि और उपाधि से घिरा रहता है इसीलिए औषधि के माध्यम से स्वस्थ किया जाता है। जैन शास्त्रों का उल्लेख करते हुए महाराज श्री ने कहा कि जैन शास्त्रों में बहुत बृहद रूप से चिकित्सा पद्धतियों का उल्लेख है। कल्याण कारक ग्रंथ में इन सभी का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। इस वर्ष मानसून रूठ जाने से मौसम प्रतिकूल होने से कुछ ज्यादा ही बीमारियां फैल रही हैं। इसलिए हम स्वस्थ रहकर हम अपने प्रभु की आराधना कर सकें।


डॉक्टर और वैद्य दोनो लोगों को स्वस्थ्य रखने के लिए अपनी सेवा समाज को देते हैं।

और इसीलिए डॉक्टर को भगवान का रूप माना जाता है। अपने डॉक्टर एवं वैद्य से कुछ भी नहीं छुपाना चाहिए। यदि शरीर को स्वस्थ रखना है तो अपने डॉक्टर को मित्र बनाएं। और अपनी आत्मा को स्वस्थ बनाना है तो भगवान को मित्र बनना चाहिए। यदि डॉक्टर और भगवान से मित्रता हो गई तो दोनों प्रकार से स्वास्थ्य ठीक हो जाएंगे। आज की परिपेक्ष पर महाराज श्री ने कहा कि लेकिन आज की सांसारिक व्यस्तता के कारण प्राणी भगवान से दूरी बना लेता है। जिसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति से स्वास्थ्य और धर्म दोनों रूठ जाते हैं। इसीलिए कुछ समय निकालकर शरीर की साधना पर भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ शरीर के द्वारा ही आध्यात्मिक एवं धार्मिक क्रियाएं कर सकते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
