ज्ञान मील के पत्थर की तरह होता है सुव्रतसागर महाराज
बीना
नगर के शांतिनाथ दिगंबर जैन परिसर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनिश्री सुव्रतसागर महाराज ने धर्म सभा में कहा कि जैसे मील का पत्थर किसी को ना दूरी देता है ना स्थान देता है बल्कि चलने वाले को बताता है कि मंजिल अभी कितनी दूर है। वह बताता है कि आपके स्थान के लिए कितना समय तय करना है। वह मील का पत्थर है ना तो दूरी है ना गति।
उन्होंने कहा इसी तरह वास्तव में देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति किसी को अपना ज्ञान नहीं दे सकता यदि कोई अपना ज्ञान किसी दूसरे को दे देता है तो वह मात्र औपचारिकता है एक उदाहरण के माध्यम से कहा कि जिस तरह कोई व्यक्ति किसी दूसरे को एक सिक्का दे सकता है लेकिन सिक्का देने के बाद उसके स्वयं के पास व सिक्का नहीं रहता। लेकिन ज्ञान में ऐसा नहीं होता ज्ञान ना लिया जा सकता है ना दिया जा सकता है।


इसके बावजूद भी संसार में ज्ञान का आदान-प्रदान देखने को मिलता है वह मील के पत्थर की तरह होता है क्योंकि हमारी आत्मा में संपूर्ण ज्ञान भरा हुआ है। ज्ञान देने वाला इंसान ज्ञान नहीं देता। जैसे स्कूल में विद्यार्थी को अपनी पढ़ाई स्वयं करनी पड़ती है। लेकिन उन्हें पढ़ने में स्कूल शिक्षक पुस्तक आदि उनकी सहायता करती है। पढ़ना तो स्वयं ही पढ़ता है।
इस तरह से हमारे पास ज्ञान है। बाहर के साधन उसे प्रकट करने में निमित्त बनते हैं। इसीलिए ज्ञान पाने की आराधना उतनी ही करनी चाहिए जितने में अपने संयम और चरित्र की सुरक्षा बनी रहे। उन्होंने कहा कि ज्ञान आत्मा का गुण है, लेकिन कर्मों के कारण वह पूर्ण रूप से अपना प्रभाव दिखने में असमर्थ हो गया है। यदि हम कर्मों को नष्ट करने की साधना करें तो ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाएगा। कर्मों को नष्ट करने की साधना ज्ञान से नहीं होती लेकिन संयम चरित्र से हुआ करती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
