परोपकार के समान कोई धर्म नहीं है मुनि श्री भावसागर महाराज
घाटोल
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि श्री विमल सागर महाराज संघ का वर्षा योग चल रहा है वर्षा योग की बेला में नित्य प्रति संतों की अमृतवाणी सुनकर नगर वासी धन्य हो रहे हैं।
शनिवार की अनुपम बेला में वाष्प पूज्य दिगंबर जैन मंदिर में अपनी अमृतवाणी से कृतार्थ करते हुए पूज्य मुनि श्री भवसागर जी महाराज ने परोपकार के विषय में प्रकार डाला और कहा कि परोपकार के समान कोई धर्म नहीं होता है। उन्होंने परोपकार को जीवन की सार्थकता बताया और कहा कि दूसरों को पीड़ा पहुंचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं होता है। सेवा से शत्रु भी मित्र बन जाता है। सेवा के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती है।

सेवा को आनंद की उपमा देते हुए महाराज श्री ने कहा कि अगर आप सेवा को अपना आनंद मान लेते हैं तो जीवन में दूसरे किसी आनंद की जरूरत नहीं पड़ेगी। पीड़ित बंधुओ की सेवा करने में जो आनंद मिलता है वह सुख धन दौलत का संचय करने से भी नहीं मिलता। उन्होंने कहा पैसा अगर किसी की भलाई में काम आता है तभी उसकी कुछ कीमत है। अपने प्राण संकट में डालकर भी दूसरे का हित करने वाले सच्चे परोपकारी होते हैं। असली संपन्नता धन दौलत से नहीं, जनसेवा से प्राप्त से आती है। इस पर प्रकाश डालते हुए महाराज श्री ने कहा कि जब हम स्वेच्छा से किसी को अपना समय देते हैं, तो मान लेना चाहिए कि हम अपना ही अंश देते है।

उन्होंने विशेष प्रकाश डाला की जो लोग यह सोचते हैं कि वह किसी भी प्रकार की सेवा करने की योग्य नहीं है। उन्हें यह बात जाननी चाही की सेवा करने से हृदय शुद्ध होता है और अहम भाव दूर होता है। परोपकार के लिए जरूरी नहीं है कि व्यक्ति के पास धन हो तभी वह दूसरों को सहयोग कर सकता है। यदि किसी को परोपकार की प्रबल भावना है, दूसरों का सहयोग कर से एक आंतरिक संतोष मिलता है।
धर्म सभा में मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने भी अपने विचार रखे और उन्होंने एकता पर बल दिया उन्होंने कहा कि एक से नहीं एकता से कम को तभी कुछ हासिल होगा। मुनि श्री अनंत सागर महाराज ने भगवान की स्तुति करने की बात कही और उन्होंने कहा कि भगवान की स्तुति करने से सब कुछ हासिल हो जाता है। मुनि श्री विमल सागर महाराज ने कहा कि हिंसा अगर ज्यादा होती है तो प्रकृति भी सहन नहीं करती है। और बादल फटते है।ज्वालामुखी आते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
