संसार परिभ्रमण का मुख्य कारण- मोहआर्यिका विज्ञाश्री माताजी* आर्यिका 105 विकक्षा श्री माताजी का 46 वां एवं ज्ञेयकश्री माताजी का 65 वां जन्मदिन हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

धर्म

 

संसार परिभ्रमण का मुख्य कारण- मोहआर्यिका विज्ञाश्री माताजी*
आर्यिका 105 विकक्षा श्री माताजी का 46 वां एवं ज्ञेयकश्री माताजी का 65 वां जन्मदिन हर्षोल्लास के साथ मनाया गया
निवाई

 

श्री शांतिनाथ दिगंबर अग्रवाल जैन मंदिर निवाई में परम पूज्य भारत गौरव आर्यिका रत्न 105 विज्ञाश्री माताजी ससंघ के सानिध्य में आज प्रातः अभिषेक शांतिधारा के तत्पश्चात अष्ट द्रव्यों से पूजा हुई मिडिया के राजाबाबू गोधा ने अवगत कराया कि कार्यक्रम में भरी धर्म सभा में आर्यिका श्री ने अपने मंगलमय प्रवचन में श्रावकों को संबोधित करते हुए कहा कि- संसार परिभ्रमण का मुख्य कारण केवल एक है यदि वह कारण हमारे द्वारा नष्ट हो जाए तो हमारा संसार परिभ्रमण भी नष्ट हो जायेगा वह कारण है मुख्य रूप से मोह , मोहिनी कर्म इस जीव को संसार में परिभ्रमण कराता है |

 

 

 

मोहित हो जाना अर्थात उस में लीन हो जाना, उस में खो जाना, अपने आप को भूल जाना, अपने स्वभाव को भूल जाना, अपने मूल धर्म को भूल जाना, और पय को ही सब कुछ मान लेना | यहां तक कि अपने अस्तित्व को भूलकर पर अपना अस्तित्व स्वीकार कर लेना यह कहलाता है मोह और जो अपने अस्तित्व को स्वयं स्वीकार कर लेता है, अपने अस्तित्व के अलावा शेष सबको पर मानता है वह व्यक्ति मोक्ष का पात्र बन जाता है अपना और पराया यह दो शब्द प्रायः करके प्रचलन में बहुत आते है दो शब्दों के अलावा व्यवहार नहीं चलता, संसार नहीं चलता, संस्था व समाज नहीं चलती यहां तक कि परिवार में दो व्यक्ति ही क्यों ना हो, साधुओं का समूह ही क्यों ना हो,

 

यदि वह आपसे में वार्तालाप कराते हैं या कोई भी शब्द व्यवहार करतें हैं तो कहीं ना कहीं उन्हें अपना पराए शब्द का प्रयोग करना पड़ता है। कार्यक्रम बाद आर्यिका श्री ने सभी भक्तजनों को मंगलमय आशीर्वाद दिया।
राजाबाबू गोधा जैन महासभा मीडिया प्रवक्ता राजस्थान से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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