” शांति से जीना चाहते हो, तो सभी को जीने दो “आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज
बड़ौत
आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि- “जो दूसरों से छल करते हैं, जो दूसरों को धोखा देते हैं, जो दूसरों को गिराने के लिए गड्ढा खोदते हैं, वे एक दिन स्वयं ही उस गड्ढे में गिर जाते हैं।” यदि तुम शांति चाहते हो, तो दूसरों को भी शांति से जीने दो। आप दूसरों से सम्मान चाहते हो, तो सभी का सम्मान करो।
महाराज श्री ने कहा की जो भी दुनिया में कानून व्यवस्था है, नियम, अनुशासन हैं वे सब मात्र अनुशासित मनुष्यों के लिए हैं। जो घर की तिजोड़ी में ताला लगा है, वह मात्र ईमानदारों के लिए है। चोर तो ताला ही तोड़कर धन ले जायेगा। सज्जन मानव ही सज्जनता से जीता है, दुर्जन उपदेश सुनकर भी सरलता पूर्वक जीवन नहीं जीता है। धर्म का उपदेश, हितकारी गुरुओं की वाणी वही श्रद्धापूर्वक सुन सकता है, जिसकी भवावलियाँ अल्प हैं। सोते हुए को पानी के छींटे मारकर जगाया जा सकता है, परन्तु सोने का नाटक करने वाले मानव को नहीं जगाया जा सकता है।

महाराज श्री ने कहा उपवास करने की
अपेक्षा कषाय छोड़ना श्रेष्ठ है। वे तपस्वी महान नहीं हैं, जो मानवः को-मानव नहीं समझते हैं, और अहंकार में जीवन जीते हैं। शत्रुता से समता श्रेष्ठ है। वाचालता से मौन श्रेष्ठ है। ढोंग से ढंग का जीवन श्रेष्ठ है। संग्राम से समझौता श्रेष्ठ है। दान से दया श्रेष्ठ है। कलह से करुणा उत्तम है। जोड़ने से छोड़ना अच्छा है।

दूसरों को झुकाना चाहते हो, तो तुम स्वयं झुकना सीखो। कुछ पाना है, तो देना सीखो। जो झुक जाता है, वह उठ जाता है। गगन-सी ऊँचाईयाँ चाहिए, तो नम्रता सीखो। मधुर भाषण, विनयशीलता उच्च- कुलीन मानवों की कुल-विद्या है। पाप मत करो, क्योंकि तुम पाप भूल सकते हो, परन्तु पाप का फल तुम्हे नहीं छोड़ेंगें। जैसे भाव करोगे, वैसा फल प्राप्त होगा। जैसे परिणाम करोगे, वैसी भविष्य की पर्याय प्राप्त होगी। पापों से बचो, पुण्य- कार्य करो। शांति से जियो, दुनिया को शांति से जीने दो । कर्तापन छोड़ो, समता पूर्वक जिंदगी जियो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
