गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी प्रथम कृति का अवलोकन करती हुईं एक चित्र…
हम उन महान महान साधिका गणिनी आर्यिका 105ज्ञानमती माताजी जिन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की है जिनका जैन समाज सदा सदा ऋणी रहेगा।
ऐसी सर्वोच्च साध्वी के जीवन पर जितना लिखा जाए कम होगा उन्होंने तब से अपने द्वारा जिन धर्म के अनेक ग्रंथों का लेखन साहित्य शुरू कर दिया था तब हमारा जन्म भी नही हुआ था पूज्य माता जी ने सर्वप्रथम अपना ग्रंथ या अपनी लेखनी से प्रथम साहित्य कब लिखा था उसके विषय में हमें आज जान लेना चाहिए पूज्य माता जी ने सर्वप्रथम सन् 1955 में अपनी लेखनी से जिनेन्द्र भगवान की भक्ति में “सहस्रनाम के 1008 मंत्रों” की रचना की, उन्होंने अब तक 500 से भी अधिक ग्रंथों का सृजन किया है। पूज्य माता जी का चित्र जिसे सदा स्मृति पर अंकित रखना चाहिए और उसे संजो कर रखना चाहिए और उस पर कुछ वक्तव्य भी देना चाहिए पूज्य माताजी अपनी प्रथम कृति का अवलोकन करते हुए इस चित्र में दिखाई दे रही हैं।
पूज्य माता जी ने नारी शक्ति का एक अलौकिक उदाहरण प्रस्तुत किया है और जिन धर्म की जिन शासन की ध्वजा को शोभायमान रखा है। पूज्य माताजी साक्षात सरस्वती की प्रतिमूर्ति हैं। जैसा उनका नाम है वैसा ही इनका नाम है ज्ञानमती माताजी सचमुच ज्ञान की मति हैं। इनका जन्म सन् 1934 में हुआ और जिन्होंने सन् 1952 में मात्र 18 वर्ष की उम्र में संसार से विरक्ति का भाव लिए की वैराग्य ग्रहण किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंज मंडी
