जिनवाणी ज्ञान से मोह नष्ट होता है आचार्य कनकनंदी
भीलूडा
ज्ञान विज्ञान दिवाकर आचार्य श्री कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि संसार, शरीर ,भोग, कर्म आदि से निवृत्ति के लिए जिनवाणी का ज्ञान है। जिनवाणी के ज्ञान से मोह नष्ट होता है। जिनवाणी के ज्ञान से विवेक जागृत होता है। जिनवाणी के ज्ञान से कषायो का मर्दन होता है व मन शांत होता है। जिनवाणी के ज्ञान से तत्व अतत्व, कृत्य अकृत्य, पुण्य पाप का ज्ञान होता है। मानसिक शांति प्राप्त होती है। संयम होता है। आचार्य श्री कहते हैं वह ज्ञान देना चाहिए जिससे सिद्धि मिलती है। शास्त्र दान ज्ञानदान करने वाला तीनों लोकों में धन्य है। जब तक अनंत ज्ञानी नहीं बने तब तक विद्यार्थी बने रहना चाहिए। जिज्ञासा के अभाव में ज्ञानार्जन संभव नहीं है। दान संप्रदान कारक नहीं होता है। जैसे धोबी को कपड़े धोने देते हैं उसके बदले उसे धन देते हैं वैसे दान नहीं होता है। लेना देना दान नहीं है। अपनी क्षमता योग्यता का सदुपयोग करना चाहिए। दान परम त्याग नहीं है। अनुग्रहार्थ के लिए दान है। ग्रंथ लेखन नाम, प्रसिद्धि ,धन कमाने के लिए लिखना दान नहीं है। स्व की निर्भरता, स्व पवित्रता, स्व उपकार, आत्मा के लिए ,आत्म कल्याण के लिए , पुण्य संचय के लिए जो दान किया जाता है वह अनुग्रहार्थ है। आत्मा को पावन करने का उद्देश्य अनुग्रह है। जो आत्मा को पवित्र करें, निर्मल करें वह पुण्य है। सम्यक ज्ञान में वृद्धि होना वह परोपकार है, पुण्य है। सम्यक चारित्र, शांति, संतोष बढ़ रहा है वह पुण्य है। भाव पवित्र हो, उदार हो , निर्द्वन्द, निष्कलंक, आध्यात्मिक आनंद हो वह पुण्य हैं। सत्य को नहीं जानना पाप है। पतित को पावन, निकृष्ट को उत्कृष्ट, नीच को उच्च बनाए वह धर्म है। पवित्र होने पर ब्रेन में गुड हारमोन स्राव होते हैं जिससे पवित्र ओरा बनता है। परोपकार, सेवा, उदारता वह पुण्य है। स्व का अर्थ आत्मा है। आत्मा, आत्मा संबंधी, आत्मा के गुण ,आत्मा के निमित्त उत्तम ,मध्यम ,जघन्य पात्र को आहार , औषधि, वस्त्र आदि देना दान है।
पूज्य महाराज श्री ने कहा की शादी में कई दिनों तक डेकोरेशन करके अनेक जीवो की हिंसा की जाती है, बैंड आदि से वायु प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण होता है, रात्रि में भोजन बनाकर अनेक जीवो की हिंसा तथा अधिक जूठन फेंकने से अनेक जीवो की हिंसा होती हैं यह सब पाप कार्य है। धार्मिक कार्यों में भी इनसे बचना चाहिए। ज्ञान दान देना समर्पण है। लौकिक प्रसिद्धि, पूजा, ख्याति आदि के भाव नहीं रख करके सम्यक प्रकार से अर्पण करना दान है। नौ प्रकार की भक्ति नवधा भक्ति तथा सात प्रकार के दाता के गुण मिलकर सोला होता है। लेकिन हम कुज्ञानी पहले केवल शुद्ध वस्त्र से भोजन बनाना ही सोला समझते थे। 1000 चावल के दानों से भात बनाने पर जो भात बनते हैं वह एक ग्रास होता है। परंतु हम पहले रोटी के एक कौर को ग्रास समझते थे। वैसे ही शुद्ध भोजन बनाने के स्थान को ही चौका समझते थे लेकिन द्रव्य क्षेत्र काल भाव की शुद्धि को चौका कहते हैं। आहार दान में विधि द्रव्य दाता पात्र आदि में विशेषता होनी चाहिए। भोजन पानी की शुद्धि को एषणा शुद्धि कहते हैं। आव्हान का अर्थ दूर से भगवान को मुनिराज को बुलाना है। अरिहंत सिद्ध असंख्यात किलोमीटर दूर होते हुए भी हम उनका आव्हान करते हैं अतः साधु देखें तब ही पड़गाहन नहीं करना चाहिए उनके देखने से पहले भी पड़गाहन करना चाहिए।
विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
