सुखी होना है तो प्रतिष्ठा, प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा तीन रोगों से बचे प्रशस्त सागर महाराज
खुरई
प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए पूज्य मुनि श्री प्रशस्त सागर महाराज ने अपने उद्बोधन में सुखी होने का उपाय बताते हुए कहा कि यदि जीवन में सुखी होना चाहते हैं तो प्रतिस्पर्धा, प्रतिष्ठा प्रदर्शन से बचें।
मनुष्य इन्हीं तीन रंगों से ग्रसित रहता है। संसार बहुत बड़ा है किस-किस लोगों से प्रतिस्पर्धा करेंगे। और किस बात के लिए इस संसार में सब एक से बढ़कर एक हैं। आज का मनुष्य इसीलिए दुखी है कि उसका पड़ोसी सुखी है। जो हमारे पास है उसी में हमें जीना चाहिए। हमें पड़ोसी के पास है जो उसे पानी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन मनुष्य की आदत सी है प्रतिस्पर्धा करने की दूसरों से। दूसरों के बाग में ज्यादा हरी मालूम होती है।
मन भव भव मैं भटकता है और भटकता ही आ रहा है। यह दुष्ट मन किसी की मानता नहीं है। जो मन की मानता है वह मानी होता है। और मनमानी करने लगता है। शुद्ध मन को मानने वाला वह आत्म ज्ञान को मानने वाला ज्ञानी संत बन जाता है। नादानी और बचकानी हरकतें बंद कर देता है। हमें दुष्ट मंकी नहीं मानना है। और मन को भी मनाना नहीं है। हमें मन का मालिक बनना है। उन्होंने कहा जिस दिन भी हमारा मन हमारी मानने लगेगा उसी दिन से हमारे जीवन में अमृत के झरने फूटने लगेंगे। हम अपने सम्राट हो जाएंगे। हालात यह हैं कि मन के गुलाम हो जाते हैं और मन के अनुसार नाचने लगते हैं। हम स्वाधीन न होकर कठपुतली बने हुए हैं। एक खिलौने के साथ-साथ मनोरंजन का साधन हो गए हैं।
दुख के दूसरे कारण अहंकार को बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि कर्तापन की एकांत झूठी मान्यता है। इसी मान्यता के कारण हम दुखी बने हुए हैं। मेरे बिना दुनिया अस्त व्यस्त हो जाएगी। ऐसा ही अहंकार दुनिया को दुखी बनाता है। आदमी भ्रम के साथ गलत धारणाओं में जी रहा है। वह केवल इसी ख्याल में जी रहा है कि मैं नहीं रहूंगा तो बच्चे दाने-दाने के लिए तरस जाएंगे। समाज बिखर एवं राष्ट्र की उन्नति रुक जाएगी। हम किसी के जीवन धार नहीं हैं। पत्नी बच्चा अपने पुण्य से जी रहा है। आने वाले जीव के पुण्य उदय से व्यवस्थाएं तैयार मिलती हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
