जैन मंदिर में भक्तामर स्त्रोत्र की 48 दीपको के साथ महा अर्चना हुई
सीकरी
जैन मंदिर में शुक्रवार शाम को भक्तामर स्तोत्र की 48 दीपकों के साथ महाअर्चना हुई। समाज के मीडिया प्रभारी पुष्पेन्द्र जैन ने बताया कि जैन मंदिर में आचार्य श्री विनीत सागर महाराज के सानिध्य व उनके मुखारविंद से भक्तामर स्तोत्र के 48 श्लोकों का वाचन हुआ जिसमें प्रत्येक श्लोक के साथ समाज के लोगों ने एक-एक दीपक की स्थापना की। इस तरह कुल 48 दीपकों की स्थापना के साथ भक्तामर स्तोत्र के सभी 48 श्लोकों का जाप किया गया व सामुहिक आरती भी हुई। इसी बीच आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को प्रवचन देते हुए बताया कि भक्तामर स्तोत्र का जैन धर्म में बहुत ही बड़ा महत्व है। इस स्तोत्र की रचना सातवीं शताब्दी में वाराणसी में जन्मे आचार्य मानतुंग द्वारा किया गया। आचार्य मानतुंग से किसी बात पर नाराज होकर राजा भोज ने उन्हें कारागार में बंद करवा दिया। जंजीरों बेड़ियों से शरीर को बांध दिया। इस कारागार में 48 दरवाजे थे, जिन पर 48 मजबूत ताले लगवा दिए गए। तब आचार्य मानतुंग ने जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान का स्मरण करते हुए भक्तामर स्तोत्र के 48 श्लोकों की रचना की। हर एक श्लोक की रचना पर एक-एक करके 48 ताले स्वयं ही टूटते चले गए। उनके शरीर पर बांधी गई सभी जंजीरों की बेड़ियों टूट कर गिर गई। उन्होंने बताया कि जब भी संतों, देश, समाज व परिवार के ऊपर कोई संकट आता है तो ऐसी स्थिति में शांत स्वभाव से भक्तामर विधान ही एकमात्र उपाय होता है। श्रद्धा भाव से किया गया भक्तामर स्तोत्र सुख शांति प्रदान करता है। जीवन की जटिलताओं को सहज बनाता है। पापों से मुक्त कराकर पुण्य मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
