जो व्यक्ति वर्तमान में जीता है वही वर्धमान बनता है निर्लोभसागर महाराज
सागर
पूज्य मुनि श्री 108 निर्लोभ सागर महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा यदि अपने आत्मा का कल्याण करना है तो अपने शरीर को देखना बंद करना होगा। आत्मा परमात्मा का भगत बनना होगा। शरीर तो एक दिन क्षीण होने वाला है। लोग आपको पूछते हैं कि आप कहते हैं आप की स्थिति कैसी भी हो लेकिन आप कहते हैं कि बढ़िया है। मनुष्य पर्याय पर ही आपका भविष्य निर्भर है। इसी के आधार पर आपके अगले भविष्य की सजा तय हो जाती है। जो भी व्यक्ति दान देने के लिए अपना धन अर्जन करता है, इसका तात्पर्य यह है की नहाने से पहले कीचड़ लगाना, यह बुद्धिमानी नहीं होती है। जीवन का प्रत्येक क्षण आपके कर्म बंध का है। सुखी होने के लिए संतोषी और बैरागी होना पड़ेगा। बैरागी व्यक्ति का कोई प्रतिद्वंदी नहीं होता है। एवं उसे कोई खतरा नहीं होता है।
महाराज श्री ने एक उदाहरण के माध्यम से समझाया कि एक व्यक्ति ने बैंक में लाखों रुपए जमा करा दिए या ब्याज पर दे दिए। लेकिन वह व्यक्ति सोचता है कि 10 वर्ष बाद कितना ब्याज या बढ़ोतरी हुई होगी। यह वह नहीं सोचता है की उसने 10 वर्षीय अपने कम किए हैं। मनुष्य पर्याय का एक क्षण करोड़ों मुद्राओं से भी नहीं खरीदा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति वर्तमान में जीता है वही वर्धमान बनता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
