जापान में बन रहा है जैन गुरु मंदिर जैन आचार्य जयंत सेन सुरेश्वर जी की प्रतिमा को लेने एक समूह आया गुजरात

धर्म

जापान में बन रहा है जैन गुरु मंदिर जैन आचार्य जयंत सेन सुरेश्वर जी की प्रतिमा को लेने एक समूह आया गुजरात
अहमदाबाद
संपूर्ण विश्व में जैन धर्म को मानने वाले काफी अनुयाई हैं इसके कारण विदेशों में भी जैन मंदिर बनाए गए हैं।

लेकिन एक गुरु मंदिर जापान में बनने जा रहा है जिसका निर्माण कार्य शुरू है। जापान से 12 लोगों का समूह जैन आचार्य जयंत सेन सुरेश्वर जी की प्रतिमा लेने बनासकांठा के निनावा गांव उपाश्रय में आया। पूज्य गुरुदेव की यह प्रतिमा जापान के नागानोकेन शहर में स्थापित होगी। इसके विषय में एक रोचक जानकारी यह है कि इस प्रतिमा को ले जाने के लिए फ्लाइट में अलग से सीट को बुक कराया गया है।

 

 

 

 

विस्तृत जानकारी देते हुए सूरत के त्रिस्तुतिक संघ में 35 साल तक ट्रस्टी श्री अमृत शाह गदगद भाव से बताते हैं कि हमारे लिए है मूर्ति नहीं साक्षात गुरु भगवंत हैं इसलिए उन्हें सीट पर पूरे सम्मान के साथ विराजित करके जापान लेकर जाएंगे।

आपको बता दें जापान से आया यह समूह 1 अगस्त को जापान के लिए रवाना होगा वर्तमान में पूज्य आचार्य श्री की फोटो को रखकर उनकी पूजन की जाती है। जापान जैसे देश में 6000 से अधिक लोग जैन आचार्य विचार का पूर्णरूपेण पालन करते हैं। इससे भी रोचक बात यह है कि जैन मत की शिक्षाओं से प्रभावित होकर हजारों लोगों ने मांसाहार का त्याग किया है इसके साथ ही अब यह लोग अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं। जिसकी शुरुआत बहुत ही अनुपम तरीके से हुई थी। वर्ष 2003 में जापान से यात्रियों और शोधकर्ताओं का एक समूह भारत भ्रमण के लिए आया और यह दल राजस्थान भी आया था जापान का एक मनोचिकित्सक चूरूसी इस समूह में मौजूद थी और उसने भी भारत की यात्रा की थी। उसी यात्रा के समय यात्रा के गाइड ने चूरसी को आचार्य श्री के दर्शन करने की सलाह दी थी जब वह दर्शन करने आचार्य श्री के समक्ष पहुंची तो पूज्य गुरुदेव ने उन्हें णमोकार मंत्र दीया उसके बाद वे जापान आ गई।

वे जैन धर्म से बहुत ज्यादा प्रभावित हो चुकी थी और इसका यह परिणाम हुआ कि वह 3 माह के बाद भारत लौट आई उन्होंने इस अलौकिक मंत्र की जाप आराधना शुरू कर दी। और इसे पढ़ने समस्या ना हो इसलिए इसे हिंदी में सीखा। पूज्य आचार्य श्री ने इन्हें तुलसी का नाम उस समय प्रदान किया था। आचार्य श्री ने तुलसी नामकरण करते हुए दीक्षा प्रदान नहीं की थी। इसका विशेष कारण यह था कि दीक्षा ग्रहण करने के उपरांत उन्हें भारत छोड़ने की अनुमति नहीं मिलती।

पूज्य आचार्य गुरुवर जिन शासन की शान है उन्हें उन्होंने 275 पुस्तकें लिखी है।एवं उन्हें राष्ट्रसंत की पदवी से भी नवाजा जा चुका है
पूज्य आचार्य श्री का विवरण बहुत विशाल है उनके द्वारा किए गए कार्यों के प्रति जिनशासन सदा सदा ऋणी रहेगा पूज्य गुरुदेव के अगर जीवन कृतित्व पर नजर डालें तो पूज्य गुरुदेव का जन्म गुजरात के बनासकांठा जिले के धराद गांव में हुआ था। वह उम्र जो जो यौवन के परवान पर होती है। लेकिन गुरुदेव की भावना स्व व पर कल्याण की थी, महज 17 वर्ष की उम्र में दीक्षा को अंगीकार कर लिया। और जिन शासन की महती प्रभावना की। गुरुदेव को 47वर्ष की उम्र में आचार्य पद प्रदान किया गया था। जैन धर्म की अलख जगाते हुए अपने संयमित जीवन में 14 राज्यों में भ्रमण करते हुए धर्म की महती प्रभावना की एवं लगभग 100000 किलोमीटर पद विहार किया। मानव जाति के प्रति पूज्य गुरुदेव ने सदाचार का पालन करने का संदेश देते हुए अनेकों लोगों को व्यसन मुक्त कराया है। इसी के साथ अनेक साहित्य की रचना करने में आपने लगभग 275 पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है। उनके परोपकार के क्षेत्र की बात करें तो पूज्य गुरुदेव के द्वारा गौशालाओं एवं चिकित्सालयो जैसे उन्नत कार्यों की प्रेरणा भी सभी को दी है। जब देश के राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा रहे तब उन्होंने गुरुदेव को राष्ट्र संत की पदवी दी थी। ऐसी महान आत्मा का 2015 में महाप्रयाण हो गया। उनके द्वारा दी गई शिक्षा उनके द्वारा दी गई प्रेरणा सदा सदा मानव जाति के लिए अनुकरणीय है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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