व्यवसायिक शिक्षा के साथ धर्मशास्त्र व लौकिक शिक्षा का अध्ययन आवश्यक है आचार्य सुंदरसागर महाराज

धर्म

व्यवसायिक शिक्षा के साथ धर्मशास्त्र व लौकिक शिक्षा का अध्ययन आवश्यक है आचार्य सुंदरसागर महाराज
सागवाड़ा
जैन बोर्डिंग में विराजित आचार्य श्री 108 सुंदरसागर महाराज ने शुक्रवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यवसायिक शिक्षा के साथ धर्मशास्त्र एवं लौकिक शिक्षा का अध्ययन करना
आवश्यक बताया।

 

आचार्य श्री ने कहा कि इससे जीवन को सहज और सुलभ बनाया जा सकता है।आधुनिक शिक्षा प्रणाली रोजगार दे सकती है,लेकिन व्यवहारिक तौर पर गुण संपन्न बनने के लिए धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलकर ही मानव का आत्म कल्याण हो सकता है। तपोभूमि भारत के ऋषिमुनियों ने जो ज्ञान का खजाना दिय है उससे वंचित रहने से सम्यक ज्ञानज्ञान और सम्यक दर्शन का अभाव रहता है। जिससे मनुष्य दुख तथा
पाप कर्मों की ओर ही अग्रसर होता है। उन्होंने कहा है कि प्राचीन भारतमें जैन शास्त्र वस्तुतः प्राकृत भाषा  में लिखे गए थे और संस्कृत भाषामें हजारों ग्रंथ लिखे हुए हैं।

 

 

आचार्य के प्रवचन से पूर्व धर्मसभा को ससंघ मुनि सुगमसागर महाराज नेसंबोधित करते हुए कहा कि विज्ञान ने विकास दिया है लेकिन बुद्धि काविनाश और जीवन में आलस्य का समागम भी कर दिया है। हर बात केलिए मशीन की आवश्यकता हो गई
है। वर्तमान दौर में तो मोबाइल हरकिसी के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इस मोबाइल के कारण हरकोई कहीं ना कहीं उलझ रहा है औरअपना रास्ता भटकता जा रहा है। उन्होंने कहा है कि आवश्यकता से ज्यादा किसी चीज का उपयोग करना  जीवन के महत्वपूर्ण क्षण को समाप्तकरता है। उन्होंने जीवन में संयम औरअनुशासन की प्रेरणा दी।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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