पवित्र सोच ही पवित्र-पथ की ओर प्रेरित करती है। आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज
बड़ोत
आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज धर्मसभा में कहा कि इस संसार में अनेकानेक जीव हैं और इसमें नाना प्रकार के जीन के विभिन्न प्रकार के विचार हैं। सभी जीव अपने विचारों के अनुसार जीवन जीते हैं। जिनकी भवितव्यता निकट है, वे शीघ्र ही सम्यक-मार्ग पर चल पड़ते हैं और जिनका संसार दीर्घ है, वह श्रेष्ठ बात को सुनना भी नहीं चाहते हैं। श्रेष्ठ विचार श्रेष्ठों के ही होते हैं।
उन्होंने कहा पवित्र सोच ही पवित्र-पथ की ओर प्रेरित करती है।निर्मल-चिंतन, सही सोच, विशाल दृष्टि, शांत परिणाम, सरलता, क्षमा भाव, विनय एवं विवेकशीलता पुण्यात्मा को ही प्राप्त होती है। एक क्षण के विशुद्ध- परिणाम अत्यंत दुर्लभ हैं। जीवन का क्षण-क्षण महत्त्वपूर्ण है। श्रेष्ठ पुरुष वही है, जो प्राण से अधिक प्रिय ‘प्रण’ को मानता हो। वचन का पक्का मानव ही महा-मानव बन सकता है।
महाराज श्री ने सीख दी और कहा की
सार क्या है, असार क्या है? इसको जानकर; को छोड़ दो और सार ग्रहण करलो। सज्जन पुरुष हंस पक्षी की असार तरह सार-सार ग्रहण कर लेते और असार को छोड़ देते हैं। सज्जन व्यक्ति स्व-पर को हितकारक होते हैं।
जिस प्रकार एक -एक बूँद से घड़ा भर जाता है और एक – एक बूँद करके नदी सूख जाती है। सुर दुर्लभ है, नर तन पाना। मानव ही अच्छे-बुरे का बोध कर पाता है। चारों गतियों में मानव पर्याय ही सर्वश्रेष्ठ पर्याय है। नर ही नारायण बनता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
