आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज के सानिध्य में आर्यिका 105 सुभगमति माताजी की सल्लेखना पूर्वक समाधि

धर्म

आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज के सानिध्य में आर्यिका 105 सुभगमति माताजी की सल्लेखना पूर्वक समाधि

(उदयपुर, राजस्थान)

परम पूज्य वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज के संघ सन्निधि में क्षपकोत्तमा आर्यिका श्री 105 सुभगमति माताजी की यम सल्लेखना पूर्वक क्षमता के साथ19/07/2023 को प्रातः 4.17 बजे समाधि मरण हुआ ।

 

 

 

आर्यिका 105 सुभगमति माताजी के जीवन कृतित्व पर एक नजर
80 वर्षीय आर्यिका 105
श्री सुभग मति माताजी ने 14 जुलाई 2023 को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से यम सल्लेखना धारण की थी। उन्होंने सल्लेखना धारण करते हुए समस्त साधुओं से क्षमा याचना की थी। एवं समस्त प्रकार के आहार का त्याग करके संस्तरारोहण धारण किया था। इनका ग्रहस्थ अवस्था का नाम
घीसीबाई था। यह जोबनेर नगर का गौरव थी।

 

80 वर्ष की उम्र में इस नश्वर काया को संसार से विरक्ति का भाव बलिए उदयपुर सेक्टर 11 संत भवन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से 15 मई 2023 को आर्यिका दीक्षा को अंगीकार किया। आचार्य श्री ने उन्हें नबी नाम देते हुए आर्यिका 10 सुभग मति माताजी नामकरण किया।

इनके पूर्व के विषय में और इनकी साधना के विषय में यदि हम इनके परिवार और अधिक जाने तो इससे पूर्व उन्होंने आचार्य श्री से ही संयम पथ पर कदम बढ़ाते हुए 4 अगस्त 2022 की बेला में श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र राजस्थान में क्षुल्लिका दीक्षा ली पूज्य गुरुदेव ने उन्हें दीक्षा देकर कृतार्थ करते हुए उन्हें क्षुल्लिका 105श्री शांतममति माताजी नाम दिया। से पूर्व ही इनकी पुत्र वधू श्रीमती चंद्रकांता जैन ने आचार्य श्री से ही संसार से विरक्ति का भाव लिए 29 अप्रैल 2015 को किशनगढ़ में आर्यिका दीक्षा ली उन्हें आर्यिका 105 श्री विचक्षणमति माताजी एवम उनके पुत्र सुरेश जैन को को आचार्य श्री ने क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की और उन्हें क्षुल्लक श्री 105 विशाल सागर जी महाराज नाम दिया।
एक ही परिवार के इतने लोग अंसार से विरक्ति का भाव लेकर धर्म की ओर अग्रसर रहे निश्चित रूप से यह संसार असार है और नश्वर है इनके परिवार ने यह सब कुछ जान लिया और अपने जीवन के लिए मुक्ति और मोक्ष मार्ग की ओर अपना कदम बढ़ाया। जीवन का अंतिम लक्ष्य समता पूर्वक संयम पूर्वक सल्लेखना पूर्वक समाधि हो और वह भी गुरु चरणों में।
हर व्यक्ति को यही भावना भानी चाहिए कि इतना तो कर दो स्वामी जब प्राण तन से निकले होवे समाधि पूरी यह भावना में भाऊ देहांत के समय में तुमको ना भूल पाऊं

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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