जो दूसरे के दुखों को देखकर आसुँ बहा जाये तो वह धर्म यदि व्यक्ति को स्वयं के दुखो पर पीडा आ जाये तो वह जहर हैं सुधासागर महाराज
आगरा
पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव 108 श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन मे कहाजो दूसरे के दुखों को देखकर आसुँ बहा जाये तो वह धर्म है।यदि व्यक्ति को स्वयं के दुखो पर पीडा आ जाये तो वह जहर हैं।
उन्होंने कहा सारी दुनिया में ईश्वर के समक्ष चढ़ाई की वस्तु पूजनीय हो जाती है।जैन व अन्य धर्म मे-चढी हुई द्रव्य को श्रावक स्पर्श तक नहीं करता। जैनी चढ़ी हुई वस्तु को हाथ तक नहीं लगाता भगवान के सामने चढ़ी हुई वस्तु को हमारे यहां स्पर्श करने से भी स्पष्ट मना किया गया है निर्माल्य माना गया।
उन्होंने कहा जो दूसरे के दुखों को देखकर आसुँ बह जाये तो वह धर्म यदि व्यक्ति को स्वयं के दुखो पर पीडा आ जाये तो वह जहर हैं महाराज जी ने एक मजदुर व एक पूजारी के उदाहरण के माध्यम से बताया है।दुसरो की पीडा पर आसू बहा जाये तो वह मोती है। शुभ है शगुन है।
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को स्मृति में लाते हुए कहा की परम पूज्य आचार्य महाराज ने एक बार कहा था दुसरे के दुःख को देखकर यदि आपके आंख में आसू आ जायें तो वह शुभ है मांगलिक है नही तो नारीयल के छेद हैं। आगे-क्रोध किसके लिए बनाया जब दुश्मन सामने हो इतना क्रोध करो कि वो आप से घबरा जाये,मान कषाय वहाँ होती हैं जहो वे तुम्हारे स्वाभिमान को नष्ट करे,सज्जनता को नष्ट,धर्म को नष्ट करें वहां मान कषाय करने को कहा है मायाचारी वहा करो जहां धर्म बचा सके मां बगैर मायाचारी के बच्चे का पालन नहीं कर सकती हैं।लोभ कषाय नही होगी तो हम गृहस्थी नही बचा पायेगें न धर्म कर पायेंगे,जितने पैसे वाले होते हैं वो लोभी होते हैं।यदि लोभी नहीं तो दान कैसे करेंगें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
