आचार्य ज्ञानसागर ने श्रमण परंपरा को जवान किया है मुनि श्री अजीत सागर महाराज
सागर
जिनके सिर पर गुरु का हाथ होता है उन्हें हाथों की लकीरों की आवश्यकता नहीं होती है। 55 साल पहले जब छोटे बालक को दीक्षा दी गई तो किसी ने उनसे पूछा कि घर से मंदिर तक की दूरी कितनी है तब वह 27 बार णमोकार मंत्र पढ़कर घर से मंदिर पहुंच जाते है। तभी लोगों को समझ में आ गया की मुनि विद्यासागर महाराज जल्द ही उच्च स्थान पर पहुंचेंगे। और वही हुआ।
यह उद्गार मुनि श्री निर्दोष सागर महाराज ने भाग्योदय तीर्थ परिसर में आयोजित आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के 56 वे मुनि दीक्षा समारोह के अंतर्गत कई। बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की ख्याति संपूर्ण विश्व में है। हम लोग तो गुरु लहरों में ही बह गए। एंजॉय तो जिंदगी भर से कर रहे थे। सही मार्ग पर चलकर रत्नत्रय निधि के दाता हैं। हर पद में कष्ट है लेकिन मुनि पद उत्कृष्ट है।
इस अवसर पर बोलते हुए मुनि श्री अजीत सागर महाराज ने कहा कि 55 वर्ष पहले आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने अजमेर ब्रह्मचारी विद्याधर को मुनि दीक्षा देकर श्रमण परंपरा को जवान और जयवंत करने का काम किया था। मात्र 22 वर्ष की उम्र में उन्हें दीक्षा दी और 26 वर्ष की उम्र में उन्हें आचार्य पद सौंपा। कश्मीर के लोगों ने आचार्य ज्ञानसागर महाराज से कहा था कि आप युवाओं को यह पद देकर गलत कर रहे हैं। 50 या 60 साल की उम्र वाले मुनिराजो को आचार्य पद सोचना चाहिए। लेकिन आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने उस समय कहा था श्रमण परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बड़ा गुरुकुल बनेगा जो आज अक्षरस साबित हुआ है।
इस अवसर पर मुनि श्री निर्लोभ सागर महाराज ने कहा इंद्रिय और इंद्रियों का दमन और इच्छाओं का विरोध करना ही दीक्षा है। आचार्य श्री वे अपनी इच्छाओं को समाप्त किया और मुनि बन गए। एक बार आचार्य श्री से किसी ने पूछा आप व्यस्त कैसे रहते हैं, तो वे बोले धर्म ध्यान में व्यस्त रहना ही हमारा व्यापार है। निरुपम सागर महाराज ने भी गुरु गुनानुवाद करते कहा कि आज पूरे भारतवर्ष में जहां-जहां साधु विराजमान है वहां आनंद और उल्लास के साथ दीक्षा दिवस मनाए गए हैं। आज आप और हम दीक्षा दिवस मना रहे हैं। 1 दिन हमारा दीक्षा दिवस भी मनेगा। इसके लिए बोलने से काम चलने वाला नहीं है, बल्कि परिग्रह का त्याग करना होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
