आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज ने 22 साल की उम्र में ही दीक्षा देकर विद्याधर को मुनि बना दिया मुनि श्री विराट सागर महाराज
रहली
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का 56 वा मुनि दीक्षा महोत्सव निर्यापक श्रमण संभवसागर महाराज सानिध्य में मनाया गया।
इस अवसर पर मुनिश्री विराटसागर महाराज ने कहा कि दुनिया का अनूठा उदाहरण है मान का गलन, जब एक गुरु ने अपने जीते जी शिष्य में योग्यता देखकर अपना आचार्य पद देते हुए, खनन से उतरकर शिष्य से ही निवेदन किया कि मेरी समाधि करवा दीजिए। शिष्य ने भी दिन-रात सेवा करते हुए शास्त्रों में वर्णित समाधि वर्णन से भी न बढ़कर अपने गुरु की समाधि कराई।
उन्होंने कहा कि आचार्य ज्ञानसागरसोच रहे थे, अस्त हो रहे ज्ञान सूर्य नेसोचा था 1 दिन की शाम, ढल जानेके बाद कौन करेगा मेरा काम, अंधकारभरे जगत में ज्ञान प्रकाश कौन भरेगा तभी एक विद्याधर नामक युवक कर्नाटक से राजस्थान पहुंचा। गुरु से
मिला, गुरु तो पहचान गए, जिसकी तलाश थी वो स्वयं आ गया। उन्होंने 22 साल की उम्र में ही दीक्षा दे दी ओर मुनि बना दिया। बहुत विरोध हुआक्योंकि उस समय 50-60 साल के
बाद ही मुनि दीक्षा लेते थे। ऊन्होंने सोचा इतनी कम उम्र का बालक कैसे मुनि चर्या का पालनकरेगा? परंतु ज्ञान की पिपासा शांत करने जब विद्याधर आचार्य ज्ञानसागरके पास पहुंचे तो उनकी पारखी नजरने उन्हें पहचान लिया। मात्र 4 साल में कन्नड़ भाषी युवक को संपूर्ण ग्रंथों काअध्ययन करा दिया, जो भी अनुभव का ज्ञान था उसे भी दे कर आशीर्वाद दिया।
आचार्य ज्ञानसागर महाराज महादानी, बैरागी थे वह कहा करते थे भावना अच्छी हो तो प्रकृति भी आपका सहयोग करती है। जैन जगत के सबसे बड़े ज्योतिषी आचार्य ज्ञानसागर जैसा चेला चाहते थे आज से 50 साल पहले राजस्थान की बंजर भूमि पर मिला। और ज्ञान की फसल लहराई। उन्होंने पूर्ण धर्म की अच्छाई को उतारकर चलना सिखाया । आज आचार्य ज्ञानसागर की यह संसार जितनी कृतज्ञता प्रकट करें कम है।
को उन्होंने आचार्य विद्यासागर जैसा ज्ञान सूर्य देकर जो उपकार किया, आज बाल ब्रह्मचारियों का इतना बड़ा संघ स्थापित कर दिया आशीर्वाद देते हुए गुरु नाम गुरु ज्ञानसागर ने विद्यासागर से कहा था, आप गुरुकुल बनाकर कुलगुरु बनाना, वचन नहीं प्रवचन देना, छोटा-बड़ा में भेद तजके तुम सबको अपना लेना।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
