मन,वचन, काय से सच्चे गुरु और प्रभु को गुरु को जिसने भी अपना आदर्श बनाया है,वह अटक भटक नही सकता अजित सागर महाराज
सागर
पूज्य मुनि श्री 108 सागर महाराज ने अजित सागर महाराज ने भाग्योदय तीर्थ सागर में अपने उद्बोधन में गुरु की महिमा को बताते हुए कहा कि मन,वचन, काय से सच्चे गुरु और प्रभु को गुरु को जिसने भी अपना आदर्श बनाया है,वह अटक भटक नही सकता।
उसकी दुर्गति भी नहीं होती,गुरु के प्रति संदेह नहीं समर्पण होना चाहिए। गुरु ने कहा ऐसा न करना ऐसा करना तो हमें मान लेना चाहिए। दूरदृष्टि के कारण ऐसा बोलते है। गुरु के बताए मार्ग पर चलना,और उनका नाम लेकर हम अपना कल्याण कर रहे है।

उन्होंने कहा गुरु की महिमा का कोई वर्णन नही कर सकता, चाहे वो लकड़ी को कलम, समुद्र के जल को स्याही, धरती को कागज बना दे, फिर भी गुरु गुणगान लिखना संभव नही है।गुरु नाम जपो। वित्त का राग लेकर गुरु के पास नही जाना चाहिए। वीतरागता की चाह लेकर जाना चाहिए। भक्तो को गुरु से डोर जोड़कर रखनी चाहिए। तो यह भव सार्थक हो जाएगा। पैसा आता है, चला जाता है, जो तुमने पुण्य के माध्यम से कमाया है वही पाप और पुण्य आपके साथ जाता है। कोई संपत्ति आपके साथ नही जाने वाली।
पूज्य श्री ने कहा गुरु का दीक्षा दिवस भाग्योदय का नही है बल्कि समस्त सागर वालो के द्वारा मनाया जाना चाहिए।
इस अवसर ऐलक श्री विवेकानंद सागर महाराज ने कहा की पुण्य के बगेर कोई वस्तु प्राप्त नही होती।धर्म के साथ पुण्य पुण्य की प्राप्ति होती है। अष्टानिका पर्व का अपना अलग महत्व है। लेकिन यदि अष्टानिका पर्व पर मुनि महाराज विराजमान हो जाए तो उनके आशीर्वाद से धर्मलाभ होता है। संयम, तप, दान से कर्मों की निर्जरा होती है।
इस अवसर पर ब्रह्मचारी संजय भया कटंगी ने कहा की सागर में आचार्य श्री की कृपा से 6 मुनिराजो का वर्षायोग प्राप्त हुआ है। पाषाण के जिनालय में आपके द्वारा दिया गया दान पुण्य का कारण बनेगा। धर्मसभा का संचालन मुकेश जैन ढाना ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
