*मुनि संबुद्ध सागर जी ने केशलोंच किया*
भोपाल ।
जैन धर्म में केशलोंच की प्रक्रिया, यानी अपने सिर के बाल और दाढ़ी पर आए बाल राख लगाकर हाथों से उखाड़ फेंकने की प्रक्रिया को केशलोंच कहते हैं।
जैन साधु के 28 मूलगुणों में से एक गुण केशलौंच भी है। जघन्य 4 महीने, मध्यम तीन महीने, और उत्कृष्ट दो महीने के पश्चात् वह अपने बालों को अपने हाथ से उखाड़कर फेंक देते हैं। इस पर से उसके आध्यात्मिक बल की तथा शरीर पर से उपेक्षा भाव की परीक्षा होती है। जैन साधु इस प्रक्रिया को बड़ी ही सहजता के साथ करते हैं। इसी क्रम में मध्यप्रदेश के भोपाल नगर में विराजमान आचार्य सुनील सागर जी के परम प्रिय शिष्य संबुद्ध सागर जी ने आज इस केशलोंच की प्रक्रिया को बड़ी ही सहजता से किया।
*केशलोंच की आवश्यकता क्यों*:
तेल लगाना, अभ्यंग स्नान करना, सुगंधित पदार्थ से केशों का संस्कार करना, जल से धोना इत्यादि क्रियाएँ न करने से केशों में यूका और लिंखा ये जंतु उत्पन्न होते हैं, जब इनकी उत्पत्ति केशों में होती हैं, तब इनको वहाँ से निकालना बड़ा कठिन काम है। जूं और लिंखाओं से पीड़ित होने पर मन में नवीन पापकर्म का आगमन कराने वाला अशुभ परिणाम—संक्लेश परिणाम हो जाता है। जीवों के द्वारा भक्षण किया जाने पर शरीर में असह्य वेदना होती है, तब मनुष्य मस्तक खुजलाता है। मस्तक खुजलाने से जूं लिंखादिक का परस्पर मर्दन होने से नाश होता है। ऐसे दोषों से बचने के लिए मुनि आगमानुसार केशलौंच करते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
