जीवन में अच्छे कर्म का फल अवश्य प्राप्त होता है आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
डोंगरगढ़
विश्व वंदनीय आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज ने चंद्रगिरी तीर्थ पर अपने प्रवचन में कहा कि धर्म,अर्थ, काम,मोक्ष पुरुषार्थ में प्रत्येक व्यक्ति लगा रहता है।
ऐसे ही एक व्यक्ति अर्थ के लिए अधिक व्यापार करने की दृष्टि से विदेश चला जाता है और वहां खूब धनार्जन के साथ बहुमूल्य वस्तुएं भी एकत्रित कर लेता है। अब वह अपने देश वापस आना चाहता है जिसके लिए वह समुद्र पार करने के लिए एक जहाज में बैठ जाता है वही उसको एक व्यक्ति मिलता है, जिससे उसकी मित्रता हो जाती है। वे दोनों जहाज के ऊपर जाकर समुद्र का निरीक्षण करते करते वार्तालाप करने लगते हैं। तभी अचानक जहाज के ऊपर की पट्टी को दूसरा व्यक्ति तोड़ देता है। जिस कारण पहला व्यक्ति समुद्र में गिर जाता है, और वह सोचता है कि अब यशह बचाने वाला नहीं है। उसकी मृत्यु निश्चित है।

वह सारा का सारा धन और कीमती वस्तुएं अपने पास रख लेता है जो व्यक्ति समुद्र में गिरा था वह सोचता है कि मैंने पूर्व में कोई पाप किया होगा जिसकी वजह से इस प्रकार के कष्ट झेल रहा हूं। और वह अरिहंत सिद्ध का जाप करने लग जाता है। तभी उसको वहां एक लकड़ी की पटिया मिल जाती है। जिसके सहारे वह समुद्र में तैरता हुआ समुद्र के किनारे तक पहुंच जाता है। वह जब समुद्र के किनारे पहुंचता है तो वहां एक व्यक्ति दोनो हाथ जोड़कर उसको नमस्कार करता है और अपने साथ चलने को कहता है। वह व्यक्ति उससे पूछता है कि आप मुझे जानते नहीं हो और साथ चलने को कह रहे हो तो वह कहता है कि यहां के राजा की प्रतिज्ञा है कि जो व्यक्ति अकेले समुद्र पार करके यहां आएगा उससे वह पानी कन्या की शादी करेगा। और अपने राज्य का आधा राज्य उसे दे देगा। देखो उसे व्यक्ति का पुण्य कहां से कहां पहुंच गया।
आचार्य श्री ने कहा कि यदि व्यक्ति जीवन में थोड़ा भी अच्छा कर्म, पुण्य कार्य करता है तो उसका फल उसको अवश्य प्राप्त होता है। जब वह राजा के पास पहुंचता है तो राजा उसकी अपनी बेटी का विवाह करने और अपना आधा राज्य देने की बात कहता है जिसे वह स्वीकार कर लेता है। फिर वहां गांव के कुछ लोग आते हैं और राजा से कहते हैं कि आप जिस लड़के से अपनी बेटी का विवाह करवा रहे हैं वह लड़का हमारे गांव का है और हमारी जाति का ही है जो भांड है और पैसे कमाने के लिए कुछ वर्ष पूर्व विदेश चला गया था।
धर्म कर्म करते रहना चाहिए और अपने पुण्य की वृद्धि करते रहना चाहिए यह सब श्रीपाल राजा का पूर्व पुण्य ही था जो उसे उतना वैभव मिला। यदि आप अच्छे भाव से धर्म कार्य करते हैं तो आपको पहाड़ जितना बड़ा पुण्य बंध होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
