जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन से पुण्य का आश्रव होकर कर्मों की निर्जरा क्षय होता है आचार्य श्री वर्धमान सागर

धर्म

जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन से पुण्य का आश्रव होकर कर्मों की निर्जरा क्षय होता है आचार्य श्री वर्धमान सागर
उदयपुर

अशोकनगर प्रवेश के दिन अशोक नगर की शाब्दिक अर्थ बतलाया था ।तीर्थंकर श्री शांतिनाथ भगवान शोक रहित होकर अशोकनगर जिनालय में विराजित हैं। श्री शांतिनाथ भगवान 6 खंड के अधिपति चक्रवर्ती राजा , कामदेव, और सुदर्शन चक्र धारी है ।पुण्य कैसे प्राप्त करें इसका प्रवचन अभी आपने सुना सभी को जिनेंद्र प्रभु का दर्शन करना चाहिए जिनेंद्र प्रभु के दर्शन श्रद्धा और विनय के साथ करना चाहिए यह मंगल प्रवचन अशोक नगर की धर्म सभा में आचार्य शिरोमणि वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट किए।

 

 

 

 

ब्रह्मचारी गजू भैय्या,राजेश पंचोलिया अनुसार,आचार्य श्री ने आगे बताया कि कार्य अगर विधि अनुसार, नियमानुसार किया जाए तो वह पूर्ण होता है। जिस प्रकार युद्ध लड़ने के लिए रणनीति बनाई जाती है ,हर लौकिक कार्य चाहे वह व्यापार हो या नौकरी का हो वह कार्य विधि अनुसार करते हैं। किंतु जब भगवान के दर्शन करते हैं तब आप दर्शन,अभिषेक,पूजन विधि और नियम भूल जाते हैं ।

 

आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि जिनेंद्र प्रभु के दर्शन से पुण्य का आश्रव होकर कर्मों की निर्जरा होती है। मूल रूप से 8 कर्म है किंतु उनकी उत्तर प्रकृति 148 है आपके यह कर्म आत्मा में बैठे हैं ।परिणामों में निर्मलता जिनेंद्र भगवान के दर्शन से आती है । दर्शन, दो हाथ, दो पैर और मस्तक जोड़कर जिनेंद्र प्रभु के दर्शन करना चाहिए ।विधि पूर्वकदर्शन नमस्कार से कर्म के निर्जरा होती है ।संसार भ्रमणमें दुख और दुर्गति मिली है । पुण्य के कारण आपको मनुष्य गति मिली है।आचार्य श्री ने आगे बताया कि अहिंसा का छोटा नियम भी भगवान बना सकता है। एक उदाहरण से बताया कि महावीर स्वामी पूर्व पर्याय में पुरवा भील थे एक छोटा सा अहिंसा का नियम लिया ,उसी प्रकार सिंह की पर्याय में भी रहे थे तिर्यंच गति में रहे उस समय मुनि के संबोधन से तिर्यंच गति से भगवान महावीर आगामी भव में बने। आचार्य ने बताया कि प्रतिमा का अभिषेक सभी को करने देना चाहिए कई मंदिरों में अभिषेक का समय निश्चित कर दिया जाता है उसके बाद अभिषेक करने नहीं दिया जाता है परंपरा ठीक नहीं है बिना अभिषेक के पूजन पूर्ण नहीं होती है आचार्य श्री ने बताया कि मंदिर से जाने के समय यह जरूर कह कर जाना चाहिए भगवान मैं फिर दर्शन करने आऊंगा ।मोबाइल के धार्मिक स्थलों में प्रचलन पर जागरूक करते हुए आचार्य श्री ने कहा मोबाइल की परिभाषा बताई कि जो मन को चित् को चलाएं मान कर दे वह मोबाइल है। धार्मिक स्थलों में धर्म सभा में मोबाइल का उपयोग नहीं करना चाहिए । विधि पूर्वक कार्य से पुण्य की प्राप्ति होती है साधु के उपदेश सुनकर ग्रहण करें।

 

इसके पूर्व संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने प्रवचन में कर्म सिद्धांत की विवेचना में बताया कि कर्म का फल अनुभव कराता है कर्म का फल दिखता नहीं है माताजी ने श्री आदिनाथ भगवान द्वारा दिए गए उपदेश के आधार पर कहा,असि,मसि कृषि ,वाणिज्य, शिल्प और कला की विवेचना कर बताया संसारी व्यक्ति प्रतिदिन जो क्रिया करते हैं वह इसी पर आधारित है। जिनवाणी के चारों अनुयोग पुण्य और पाप में भेद बताते हैं ।माताजी ने श्रावक और श्राविकाओं के लिए 6 आवश्यक क्रियाएं ,देव पूजा, गुरु पूजा ,स्वाध्याय ,संयम , तप और दान के बारे में विस्तृत जानकारी दी ।धर्म सभा में श्रोता के क्या-क्या गुण होना चाहिए। श्रोता भक्ति मान होना चाहिए उसे समर्पित भाव से प्रवचन सुनना चाहिए । श्रोता को मिश्र भाषी होना चाहिए ,सभा में अहंकार रहित होना चाहिए ,श्रोता की सुनने में रुचि होना चाहिए और आसन की स्थिरता होना चाहिए। ग्रहण करने की क्षमता और तथा निंदक नहीं होना चाहिए।
धर्म सभा के प्रारंभ में सीमा अशोक गोधा ने मंगलाचरण किया।चित्र अनावरण,दीप प्रवज्जलन, कमेटी सदस्यों द्वारा किया गया।आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन और शास्त्र भेट पुण्यार्जक परिवार द्वारा किया गया दिनांक 9 मई को आचार्य श्री संघ का मंगल विहार सेक्टर 4 और 5 में अल्प प्रवास के लिए होगा। 21 मई से 25 मई तक सेक्टर 11 में होने वाले पंच कल्याणक में संघ सहित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का सेक्टर 11 में 14 मई को आगमन होगा।
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सलय भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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