आदिनाथ भगवान की चतुर्थ क़ालीन प्रतिमा जो बद्रीनाथ मैं भगवान विष्णु के रुप में पूजी जाती हैं ! डॉक्टर कल्याणमल गंगवाल पुणे ने सांझा किया
बद्रीनाथ
आदिनाथ भगवान की चतुर्थ कालीन प्रतिमा है जो बद्रीनाथ में स्थित है ।भगवान विष्णु के रूप में पूजी जाती है। इसके कई प्रकार के साक्ष्य मिलते हैं। लेकिन मशहूर डॉक्टर शाकाहार प्रचारक डॉक्टर कल्याणमल गंगवाल पुणे ने अपना अनुभव और इस प्रतिमा को भगवान आदिनाथ की होने के साक्ष्य भी दिए।
उन्होंने बताया कि 27 अप्रैल 2023 का दिन बड़ा पावन रहा जब बद्रीनाथ मंदिरके द्वार खुल गये और मौसम भी ख़ूल गया पिछले कुछ दिनों से चला ख़राब मौसम बदल गया था। बर्फकी बारिश / माइनस सात /आठ डिग्री तापमान / भयानक ठण्ड हवा बदल गयी ! सूरज निकल आया बारिश बंद हुई और- प्रभु आदिनाथ के दर्शन हुए! आचार्य निर्भय सागर जी का प्रवचन हुआ !
डॉ गंगवाल ने उनकी नयी किताब “ सुखी जीवन का आधार – शाकाहार “ गुरुदेव को भैट की ! उन्होंने कहा कि यहाँ का अणु अणु पवित्र हैं ! यह भूमि हमारे प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की तपोभूमि है यहाँ सें ही उन्होंने निर्वाण भूमि कैलाश के ओर प्रयाण किया था !

विशेष जानकारी देते हुए कहा की आदिनाथ भगवान ने तपस्या करके मोक्ष को प्राप्त किया था। जो कैलाश पर्वत के रूप में जाना जाता है। यहां से कैलाश पर्वत जाने का रास्ता है। यहां से कुछ दूर चलने पर नीलकंठ पर्वत है यहां पर भगवान आदिनाथ के पिता नाभि राय के चरण दिखाई देते हैं। गुफा के अंदर एक मरूदेवी का मंदिर है।
बद्रीनाथ की प्रतिमा देखने पर यह मालूम होता है कि यह मूर्ति जैन है एवं भगवान आदिनाथ की है। आज से कही वर्षो पूर्व अन्य मत के अनुयायियों ने नारद कुंड में इस मूर्ति को उठाकर डाल दी लेकिन वह प्रवाहित नहीं हो सकी। तभी यह मूर्ति वापस यहां स्थापित कर दी गई। जैन प्रतिमाओं का अभिषेक किया जाता है। लेकिन वैष्णव प्रतिमाओं का अभिषेक प्रतिदिन नहीं किया जाता है। जबकि वैष्णव प्रतिमाओं का स्वरूप अलग हुआ करता है।

उन्होंने बताया कि आगे जाकर यहां घंटाकरण क्षेत्रपाल मंदिर विराजित है जो शाकाहारी होते हैं। एक और रोचक जानकारी उन्होंने प्रदान की की आदि शंकराचार्य के समय में यहां के स्वरूप को बदला गया था। यहां पर जो पुजारी रखे जाते हैं वह भी शाकाहारी होते हैं। साथ ही यहां जो पुजारी रखे जाते हैं वह केरल राज्य के होते हैं वर्तमान में केरल के ही जिनका नाम नंबूदरी है।

उन्होंने बताया कि यहाँ से चार पांच किलोमीटर की दूरी पर माणा गाँव
हैं।भारत भूमि का चायना बॉर्डर के पहले का अंतिम गाँव !! गणेश गुंफा जहां “ महाभारत कां लेखन महातपस्वी व्यास ऋषि द्वारा किया गया था ! यहाँ पर ही “भीम पुल “ है ! नदी सरस्वती यहा सें लुप्त होकर “ प्रयाग राज में प्रकट होती हैं जहां गंगा – जमुना – सरस्वती का संगम होता हैं !
हर एक जैन व्यक्ति को जैनियो के चार धाम यात्रा ज़रूर करनी चाहिए पूर्व के सम्मेद शिखर पश्चिम के गिरनार दक्षिण के बाहुबली और उत्तर के बद्रीनाथ !!
उन्होंने माणागांव के बारे में बताया कि यहां एक देवी का मंदिर है जो कई बार टूटा और कई बार बना है। यहां के देहाती इसे मरू देवी का मंदिर भी कहते हैं। और कहा जाता है कि यहां जो भी मांगे मानी जाती है वह पूरी होती है।
जोशी मठ पर एक जैन परिवार का घर हैं ,मनोज जैन के मकान पर गृहचैत्यालय स्थित हैं। आज से 30 वर्ष पूर्व नारद कुंड में कई ज्ञानियों की मृत्यु हुई थी। उन्हें निकालने की कोशिश करते वक्त काफी खंडित मूर्तियां मिली जो तीर्थंकरों की थी। अलकनंदा नदी के नारद कुंड में वापिस विसर्जित कर दी।
इन सभी के प्रमाण से यह उल्लेख मिलता है कि बद्रीनाथ भगवान की जो प्रतिमा है वह भगवान आदिनाथ की है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट
