घने जंगल में आचार्य आर्जव सागर महाराज का हुआ रात्रि विश्राम
जबेरा
आकाश ओढ़न, धरती बिछोना ऐसे होते है निर्ग्रंथ संत वे केवल अपनी साधना करते है। पद विहार कर धर्म की प्रभावना कर स्व व पर कल्याण करते है।
जिसका उदाहरण देखने को मिला जब आचार्य श्री आर्जव सागर जी मुनिराज संघ सहित सिंग्रामपुर से जबेरा की ओर विहार रत थे। सोमवार की शाम सूरज ढलने पर आचार्य संघ का सिंग्रामपुर के जंगल में ही रात्रि विश्राम हुआ। दिगंबर संत सूरज ढलने के बाद बिहार नहीं करते हैं एहसास भी किया जाता है की रात्रि में जीवों की हिंसा न हो। सचमुच दिगंबर मुनि की साधना किसी तपस्या से कम नहीं है। पंचम काल में दिगंबर की साधना एक महान साधना है।

सिंग्रामपुर के घने जंगल में ससंघ केचरण थम गए और वहीं साधना में लगगए।ऐसी तप साधना पंचम युग में सहज नही। पूज्य श्री वह संघ ऐसे घनघोर वन में आत्म साधना में लीन रहें। समता रसपान करते हुए पूज्य श्री निर्विकल्प साधना रत रहे। उन्होंने सुबह सूरज की पहली किरण के साथ विहार किया। रात्रि में खुले आकाश में ऐसे ही साधना में लीन रहे। क्या खूब वर्णन है दिगंबर संत के विषय में किसी ने लिखा है,
हो अर्ध निशा का सन्नाटा वन में वनचारी चरते हो।
तब शांत निराकुल मानस तुम तत्वों का चिंतन करते हो। बाद में जंगल के हिंसक जानवरों से नुकसान न हो, इसलिए अस्थायी रूप से बरसाती का घेरा बना दिया, लेकिन तेज ठंडी हवा के झोकों के बीच मुनिराजों कीकी तपस्या कम नहीं हुई।
धन्य है ऐसे निष्काम साधक
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
