दूसरों की पीड़ा को ध्यान रखना भी तप कहलाता है क्षीरसागर महाराज
रामगंजमंडी
नगर में विगत 7 दिनों से 10 लक्षण पर्व पर धर्म प्रभावना हो रही है। और कोई व्रत आदि कर, कोई उपवास कर, और कोई कोई प्रकार का रस छोड़कर तप कर रहा है। अभी जैन समाज के सभी लोगों की दिनचर्या में काफी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। सभी प्रकार के कार्यों को छोड़ धर्म साधना में लगे हुए है। जैन दर्शन में दसलक्षण पर्युषण पर्व का विशेष महत्व बताया गया है।
इस पर्व के सातवे दिन उत्तम तप धर्म की पूजन की गई और तत्त्वार्थ सूत्र के सातवें अध्याय की वाचना की गई। पूज्य ऐलक श्री क्षीरसागर महाराज ने उत्तम तप धर्म पर प्रकाश डाला और उन्होंने कहा 12 प्रकार के तप करके व्यक्ति अपनी कर्मों की निर्जरा कर सकता है। उन्होंने कहा कि चारों प्रकार के आहार का त्याग उपवास अनशन कहलाता है। इस पर प्रकाश डालते भी कहां की जीवन में उपवास नहीं किया तो तुम अपने जीवन का आनंद नहीं समझा प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ के अनुसार तप करना चाहिए और उपवास में दोपहर में शयन करने से बचना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार तप करना चाहिए। और नहीं कर सके तो जो तपस्वी है उनकी सेवा करनी चाहिए तब भी अनशन व्रत हो जाएगा। भोजन से कम खाना उनोदर तप कहलाता है। इच्छा का निरोध भी तप होता इसी तरह हम इच्छा पर नियंत्रण करके, किसी भी प्रकार का रस छोड़कर उस पर नियंत्रण करना रस परित्याग होता है। महाराज श्री ने कहा की जिन रसनो से प्रीति बढ़ती है उनका त्याग करना चाहिए। उन्होंने शक्कर नमक मेदा को सफेद जहर बताया इनका उपयोग नियंत्रण में करना चाहिए यह बहुत हानिकारक होता है। कुछ लोग ऊपर से नमक डालते हैं। इससे बचना चाहिए। इसी प्रकार एक प्रकार के और तप का वर्णन करते हुए बताया कि एक स्थान पर रहना ध्यान करना शयन करना यह भी एक प्रकार का तप होता है।

महाराज श्री ने कहा शरीर से ममत्व को छोड़कर एक स्थान पर ध्यान करने को भी तप कहां धूप आदि में रहकर भी साधना करना भी तप कहलाता है लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव न पड़े। ऐसी साधना खड़े होकर भी करते है। गलती होने पर नियम लेना भी प्रायश्चित नाम का तप होता है। इसके साथ साधु संतों की विनय करना और उनकी वैयावृति करना और उनकी ज्ञान दर्शन चारित्र की विनय करना भी तप होता है। इस प्रकार का तप एवं विनय करके व्यक्ति तीर्थंकर प्रकृति का बंध करता है। इसी प्रकार का विनय करके नारायण
श्रीकृष्ण ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। आगामी चौबीसी में तीर्थकर होगे।

महाराज श्री ने कहा कि जिनवाणी के चरण में बैठकर अध्यन करना स्वाध्याय कहलाता है।
जो इसके अध्यन से प्राप्त होगा वह कहीं नहीं होगा। इसके अध्यन से मन के विकार दूर हो जाते है। यदि भारतीय संस्कृति के बारे में जानना है तो जैन दर्शन का साहित्य पड़ा जाए। उन्होंने इसका श्रेय महिलाओं को दिया जिन्होने इसका संरक्षण किया। मुनि श्री ने तप के विषय में कहा कि काया का ममत्व छोड़ना भी एक प्रकार का तप होता है। ध्यान करके भी तप किया जा सकता है लेकिन व्यक्ति ध्यान करता नहीं है। महाराज श्री ने कहा कि अपनी शक्ति को छुपाना नहीं चाहिए और अपनी सामर्थ्य अनुसार तप करना चाहिए। दूसरों की पीड़ा का ध्यान रखना भी तप कहलाता हे।
श्रीमहावीर दिगंबर जैन मंदिर के अध्यक्ष महेंद्र ठौरा एवम महामंत्री पदम सुरलाया ने बताया कि आज मंदिर जी में प्रथम अभिषेक शांतिधारा का पुण्य लाभ श्रीमती अनिता के जन्म दिवस पर कमलेश क्षितिज विधिका चयन सरवाड़िया को एवम द्वितीय शांतिधारा का पुण्य लाभ विजय अनिता हरसौरा को प्राप्त हुआ संध्याकाल पर भक्तामर स्त्रोत से मंत्रित 48 दीपकों की महाआरती का सौभाग्य अशोक कुमार संजय हित दुगेरिया को मिला। महाआरती के पश्चात श्री वीर जैन सोशल ग्रुप द्वारा धार्मिक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें सभी वर्ग के लोगों द्वारा बढ चढकर भाग लिया
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट
