अक्षय तृतीया के दिन भक्तों व शिष्यो का आहरदान के लिए पाड़वा, सागवाडा,भिलुडा,पुनर्वास कालोनी के लोगो का ताता लगा।

धर्म

अक्षय तृतीया के दिन भक्तों व शिष्यो का आहरदान के लिए पाड़वा, सागवाडा,भिलुडा,पुनर्वास कालोनी के लोगो का ताता लगा।

सागवाड़ा
योगेंद्र गिरी पर अक्षय तृतीया के दिन भक्तों व शिष्यो का आहार दान हेतु पाडवा,सागवाडा,भिलुडा,पुनर्वास कालोनी के लोगो का ताता लगा।

इस दिन श्रेयांस राजा ने आदिनाथ भगवान को लगभग 1 वर्ष के उपवास के बाद प्रथम आहार इक्षु रस का दिया था। जब आदि ब्रह्मा आदिश्वर श्री आदिनाथ भगवान राज्य कर रहे थे तब भोग भूमि का अंत हो गया था अतः कल्पवृक्ष सब नष्ट हो गए थे जिससे प्रजा क्षुभित होकर प्रभु के पास पहुंची, अब हम जीवन यापन किस प्रकार करें प्रभु हमें सिखाएं? तब आदिनाथ भगवान ने सबसे पहले कृषि से अनाज उत्पन्न करके भोजन कर के अपने जीवन को बचाओ इसका उपदेश दिया तथा कृषि करना सिखाया है।

 

 

आत्मरक्षा के लिए असि अर्थात तलवार चलाना सिखाया लेखन पठन के लिए मसी का उपदेश दिया भौतिक विनिमय के लिए वाणिज्य तथा गृह उपकरण, शिल्प कलाएं आदि सभी प्रकार का उपदेश दिया। परस्पर में सहयोग सेवा आदि का उपदेश दिया अतः ब्रह्मा कहांलाए। सर्वप्रथम अपनी पुत्री को जिसका नाम ब्राह्मी था उसको ब्राह्मी लिपि तथा दूसरी पुत्री सुंदरी को अंक गणित सिखाया इसलिए आदि गुरु कहलाए। उन्होंने राजा बनकर शासन किया राजनीति न्याय कानून सब आपने अपने पुत्रों तथा प्रजा को सिखाएं। आदिनाथ भगवान का प्रथम पुत्र भरत चक्रवर्ती इसके नाम से आर्य देश का नाम भारत पड़ा जो हमारा देश शस्य श्यामला है। उनके दूसरे पुत्र बाहुबली प्रथम कामदेव तथा शक्तिशाली हुए अर्ककिर्ति आदि अन्य पुत्रों को भी विभिन्न विधाएं सिखाइ आपको जब वैराग्यवान हुआ तब सब पुत्रों को राज्य अलग-अलग बांट दिया जिससे अनेक देशों का उदय हुआ तथा पुत्रों के नाम से वंश चला भगवान ने इक्षु रस का प्रयोग सिखाया इसलिए इक्ष्वाकु वंश कहलाया सूर्य चंद्र आदि वंश पुत्रों से प्रारंभ हुआ दीक्षा के लिए प्रयाग जंगल में प्रयाण हुआ।


जिससे प्रयाग इलाहाबाद प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अक्षय वटवृक्ष के नीचे दीक्षा ग्रहण की जो दीक्षा वृक्ष बना। दीक्षा के बाद 6 महीने के उपवास का नियम लेकर आत्मा ध्यान में लीन हो गए जिससे उनके केश जटा जूट हो गए। 6 महीने पूरे होने के बाद आहार हेतु अनेक गांवों में भ्रमण करते हैं परंतु किसी को आहार दान की विधि नहीं ज्ञात होने के कारण 6 महीने कुछ दिन तक आहार नहीं मिला श्रेयांस राजा को पूर्व जन्म का आहार दान जाति स्मरण से याद आया जिससे उन्होंने पडगाहन करके आदिनाथ भगवान को प्रथम आहार इक्षुरस का दिया। इस दिन अक्षय तृतीया को दिया और इस दिन से दान की परंपरा प्रारंभ हुई थी अतः इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। इस प्रकार आदिनाथ भगवान ने 12000 वर्षों तक घोर तपस्या अशोक वृक्ष के नीचे की जिससे अशोक वृक्ष का नाम बोधि वृक्ष पड़ा। इसके बाद पूरिमताल में केवल ज्ञान हुआ। देवों ने आकर के समवशरण के मध्य में गंधकुटी बनवाई इसके बीच मे स्वर्ण कमल से भी चार अंगुल ऊपर अधर में भगवान विराजमान होते हैं। वहां से उनकी दिव्य ध्वनि सर्व भाषामयी सभी जीवो अपनी अपनी भाषा में समझ में आने वाली सर्व भाषा में दिव्य ध्वनि से भगवान का प्रवचन हुआ। प्रभु ने ज्ञान विज्ञान का संबंधन दिया, आत्म विकास का मार्ग बताया, वैश्विक तत्व का रहस्य बताया इस प्रकार अनेक वर्षों तक दिन में 4 बार उपदेश देते हुए अंत में कैलाश पर्वत पर विराजमान होकर योग धारण करके स्वयं सिद्ध हो करके मोक्ष धाम पधारे। भगवान का रूप सच्चिदानंद है। भगवान सत्य शिव सुंदर अविकारी बन करके अविनाशी अनंत वैभव को प्राप्त किया। आदिनाथ भगवान प्रकृति अणु शिक्षा संस्कृति के आदि विज्ञानि तथा सापेक्ष सिद्धांत के आदि ज्ञाता थे। न्याय राजनीति के आद्य प्रणेता, आधुनिक या प्राचीन ज्ञान देश विदेशों के संपूर्ण ज्ञाता थे, समस्त रिती रिवाज ,समाज ज्ञान आदि के ज्ञाता थे।

 

आचार्य श्री कनक नंदी गुरुदेव कहते हैं कि आपका आदर्श मुझे प्यारा है अत मै आपका भक्त शिष्य हूं आप की भक्ति करने से आपके समान बनु इसलिए मैं आपकी भक्ति करता हूं। इस अवसर पर मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आदि ब्रह्मा आदिश्वर श्री आदिनाथ महान हो गुरुदेव द्वारा रचित कविता द्वारा मंगलाचरण किया। विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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